मेरठ। चुनाव से कई महीनों पहले से सक्रिय अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) इस बार भले ही सपा का वोट प्रतिशत और 2017 से अधिक सीटें जीतने में सफल हो गए गए हो। लेकिन वे जनता को वोट बैंक रूप में बदलने में नाकाम ही रहे। हालांकि गन्ना बेल्ट में सपा रालोद गठबंधन को काफी अच्छी बढ़त मिली है। लेकिन जिस तरह की उम्मीद अखिलेश को जनता से वोटों की थी उसको पाने में सफल नहीं हो सके। सपा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) की सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर प्रचार किया। अखिलेश ने सपा की सत्ता में वापसी के लिए प्रदेश में जातियों का गठजोड़ किया। किसान आंदोलन को जमकर हवा देते हुए उसको भुनाने की कोशिश की। रालोद से हाथ मिलाया। इतना ही नहीं महंगाई,पुरानी पेंशन और बेरोजगारी जैसे मुददों को भी चुनावी मंच से उठाया लेकिन इसके बाद भी जनता उनके झासे में नहीं आई। भाजपा ने प्रदेश में अपने दम पर 255 सीटें अकेले जीतकर सत्ता में वापसी की है। हालांकि 2017 के मुकाबले भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरीके से विपक्ष ने भाजपा की घेराबंदी की थी।
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उसको देखते हुए यह अच्छा प्रदर्शन ही कहा जा सकता है। सपा ने इस बार चुनाव में 111 सीटें जीती। सपा की इस जीत में हीं न कहीं उसके साथ गठबंधन में आए छोटे दलों का भी हाथ कहा जा सकता है। 2017 में जहां सपा को मात्र 47 सीटें मिली थी।
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उसकी अपेक्षा 2022 में सपा का प्रदर्शन बेहतर ही कहा जा सकता है। पश्चिमी से चले एंटी कंम्बेंसी विरोधी लहर को ऐन चुनाव के समय भुनाने में सफल नहीं हो सकी। वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर राजनीतिक अनुभव का अकाल भी सपा को सत्ता से दूर रखने का एक बड़ा कारण साबित हुआ। मुलायम के सपा अध्यक्ष पद से सन्यास लेते ही अखिलेश के जाथ में जब से सपा की बागडोर आई है। उसके बाद से मुलायम काल के वरिष्ठ सपाई अखिलेश यादव (SP Akhilesh Yadav) ने साइड लाइन कर दिए। सपा में अखिलेश एकला चलों की राह पर चल पड़े नतीजा विधानसभा चुनाव के परिणाम में सबसे सामने हैं। वहीं भाजपा को अखिलेश की राजनैतिक सूझबूझ और चालों को बारे में पहले से पता था। भाजपा के दिग्गज नेता और राजनीति के चाणक्य यह तो जानते थे कि सपा और उसके गठबंधन दल भाजपा को कुछ सीटों पर नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन इस बात से भी अश्वस्त थे कि सरकार भाजपा की ही बनेगी। अंत में हुआ भी वहीं जो कि चुनाव परिणाम के रूप में सबसे सामने है।

