कांग्रेस के साइलेंट प्रचार से भाजपा परेशान क्यों?

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अमित बिश्नोई
हिमाचल हो या उसके बाद गुजरात, कांग्रेस पार्टी की चुनावी रणनीति से भाजपा काफी परेशान दिख रही है. एक तरफ भाजपा का प्रचंड प्रचार अभियान और उसके सामने कांग्रेस पार्टी का साइलेंट चुनावी प्रचार, लोग भी विश्लेषण करने में लगे हैं कि कांग्रेस पार्टी यह कौन सी रणनीति पर चल रही है. राहुल के राजनीति में आने के बाद शायद यह पहले चुनाव होंगे जो बिना राहुल के लड़े जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश चुनाव प्रचार से राहुल गाँधी पूरी तरह दूर रहे और अबतक गुजरात से भी दूर हैं हालाँकि 20 नवंबर को भारत जोड़ो यात्रा से ब्रेक लेकर गुजरात जायेंगे और चुनावी सभा भी करेंगे, कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक राहुल की गुजरात में कुल चार चुनावी सभाएं रखी गयी हैं जो गुजरात जैसे प्रदेश को देखते हुए बहुत कम हैं.

कांग्रेस पार्टी ऐसा क्यों कर रही है? क्यों वह इस बार राज्यों के चुनावों में अपने सबसे बड़े नेता को दूर रख रख रही है, मोदी जी को भी इसकी चिंता खाये जा रही है, भाजपा भी परेशान है. उसे कोई मसाला नहीं मिल रहा है. दरअसल 2014 के बाद से भाजपा हर छोटा बड़ा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर ही लड़ती आ रही है. चुनाव भले ही किसी भी राज्य का हो लेकिन मोदी जी के भाषणों में सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान, मुसलमान, CAA,NRC, समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे ही मौजूद होते हैं, पिछले 70 सालों की ही चर्चा होती है, स्थानीय मुद्दे, राज्य की समस्याओं से दूर दूर तक नाता नहीं रहता। सारी कहानी दिल्ली से शुरू होती है और दिल्ली पर ही ख़त्म होती है. अभी हिमाचल में प्रधानमंत्री ने खुलेआम कहा भी कि अगर आप यहाँ पर भाजपा को नहीं जिताओगे तो दिल्ली से विकास योजनाएं यहाँ कैसे आएँगी और कैसे लागू होंगी, यानि एक तरह से हिमाचल के लोगों के लिए एक शर्त थोंप दी कि दिल्ली की विकास योजनाएं चाहिए तो हिमाचल में भाजपा सरकार बनाइये, कोई और सरकार बनी तो फिर दिल्ली को भूल जाइये.

खैर यह तो मोदी जी का स्टाइल है. पहले सिर्फ दुसरे लोगो से मोदी मोदी कहलाते थे अब खुद ही मोदी मोदी कहने लगे हैं, वहीँ कांग्रेस पार्टी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है उसने राष्ट्रीय मुद्दों को लोकसभा के लिए छोड़ दिया है और राज्यों के चुनाव में स्थानीय मुद्दों को ही फोकस बनाया है और इसी कड़ी में उसने अपने राष्ट्रीय नेता को भी हिमाचल और गुजरात से दूर रखा है. हिमाचल की बागडोर इसबार प्रियंका ने संभाली, हिमाचल में उनका घर होने के नाते वह वहां की स्थानीय नेता ही थी. उन्होंने वहां पर मुद्दे पुरानी पेंशन, सेब बागानों की समस्याओं, रिटायर्ड फौजियों के मुद्दों को ही प्राथमिकता दी. गुजरात में भी उनका प्रचार हिमाचल की तर्ज़ पर चल रहा है, अधिकांश मुद्दे गुजरात से ही जुड़े हुए हैं, इसबार भारत-चीन सीमा का ज़िक्र नहीं, राष्ट्रीय मुद्दों से दूरी है. यहाँ भी पुरानी पेंशन, बेरोज़गारी भत्ता, नौकरियों की बहाली, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ही ज़ोर है.

दरअसल राष्ट्रीय मुद्दों की राजनीती में भाजपा और मोदी अपने को सहज पाते हैं. गुजरात में 27 वर्षों से भाजपा का राज है, चाहे जितना अच्छा शासन किया हो, इतनी लम्बी समयावधि के बाद परिवर्तन की बात उठना एक साधारण सी बात है, फिर आपके पास राज्य की उपलब्धियों को बताने को ज़्यादा कुछ नहीं है. कांग्रेस पार्टी ने अब इस बात को अच्छी तरह समझ लिया है और इसीलिए वह इसबार भाजपा की पिच पर नहीं खेल रही है और भाजपा इसीलिए ज़्यादा परेशान है. हिमाचल से उसके लिए जो ख़बरें आ रही हैं वह अच्छी नहीं हैं, वहां कांग्रेस के साइलेंट प्रचार ने शायद काम किया है और उसी साइलेंट प्रचार को कांग्रेस पार्टी गुजरात में भी आज़मा रही है. हालाँकि यहाँ पर मामला एक VVIP स्टेट का है इसलिए उसमें न चाहते हुए भी राष्ट्रिय मुद्दों का तड़का ज़रूर पड़ेगा। मोदी जी का गुजरात में महाचुनावी अभियान शुरू होने वाला है. और उसे काउंटर करने के लिए ही शायद राहुल की चार चुनावी सभाओं को लगाया गया है. अब देखना है कि कांग्रेस पार्टी अपने हिमाचल फॉर्मूले पर ही डटी रहेगी या फिर गुजरात में उसकी रणनीति में कुछ बदलाव आएगा। मगर इतना तो तय है कि कांग्रेस की चुप्पी से भाजपा के अंदर हलचल तो ज़रूर है.

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