Maharashtra Political Crisis: उद्धव के बदले तेवरों से शिंदे की बढ़ी चिंता

आर्टिकल/इंटरव्यूMaharashtra Political Crisis: उद्धव के बदले तेवरों से शिंदे की बढ़ी चिंता

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अमित बिश्‍नोई

महाराष्ट्र में राजनीतिक संग्राम अब सत्ता पलट  से ज़्यादा पार्टी पलट की तरफ बढ़ता जा रहा है, शिव सेना का बाग़ी गुट अभी तक यह पैंतरा चल रहा था कि उसकी बगावत का कारण एनसीपी और कांग्रेस का साथ है लेकिन एकनाथ शिंदे के इस दांव को उद्धव के इस बयान ने बेअसर कर दिया किया कि शिवसेना महाविकास अघाड़ी से निकलने को तैयार है लेकिन बागी विधायकों को मुंबई आकर इसके लिए उद्धव ठाकरे से बात करनी होगी। इस दांव के नाकाम होने के बाद एकनाथ शिंदे की तरफ से जो भी एक्टिविटी हो रही है उससे यह पूरी तरह साफ़ हो गया है कि उनकी दिलचस्पी सरकार हड़पने में नहीं बल्कि पूरी पार्टी हड़पने में है और उनके पीछे एक राष्ट्रीय पार्टी मज़बूती से खड़ी है. 

ज़ाहिर सी बात है कि बात जब खुद के वजूद पर आ जाय तो नरमी छोड़ सख्ती पर उतरना ही पड़ता है, घी सीधी ऊँगली से न निकल रहा हो तो टेढ़ी करना अनिवार्य हो जाता है और अब असली शिवसेना ने अपनी ऊँगली को टेढ़ा कर दिया है, आज उद्धव की शिवसेना के जो बयान जो रूप, जो कार्यशैली दिखाई दी है उसने बाला साहब ठाकरे के समय की याद दिला दी है, आज शिवसेना के बयानों में वही धमक सुनाई दी जो बाला साहब के बयानों में सुनाई देती थी. उद्धव का फाइनल वार्निंग देना, राउत का मुंबई में आग लगने की बात कहना, शिव सैनिकों का बागियों के ऑफिसों पर हमला करना, सबकुछ पुरानी शिवसेना की याद दिला रहा है और यही वजह है कि गुवाहाटी में बैठे बागियों की हालत बिगड़ी हुई है. उन्हें अब अपने परिवार की परवाह हो रही है जो वो सूरत और गुवाहाटी जाते हुए अपने साथ नहीं ले गए थे, अपनी सम्पत्तियों की सुरक्षा भी खतरे में नज़र आ रही है, तभी उन्होंने उसी को पत्र लिखकर परिवार की सुरक्षा करने की गुहार लगाई है जिसके खिलाफ उन्होंने बगावत की थी. 

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दरअसल विरोध की आग में अंधे होकर एकनाथ शिंदे इतने आगे निकल गए हैं कि अब उनके लिए वापसी बहुत मुश्किल हो चुकी है, यहाँ तक कि वह मुंबई भी वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. कल पता चला था कि वह मुंबई के लिए निकले हैं लेकिन बाद में तीन घंटे बाद वो फिर होटल में नज़र आये. अभी उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि कौन सा कदम उठाया जाय और इसी चक्कर में बहुत से कदम उठा रहे हैं जिनका कानूनी अंजाम भी बहुत लचर होने वाला है, कभी वो विधानसभा के उपाध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भेजते हैं वो भी एक गुमनाम ई मेल से, और वह भी गलत जगह पर. इस अविश्वास प्रस्ताव में 38 न होकर 33 विधायकों के दस्तखत हैं, अभी पता नहीं कितने असली हैं क्योंकि 38 विधायकों के पहले भेजे गए समर्थन पत्र में कई हस्ताक्षर फ़र्ज़ी निकले थे. इससे यह साबित होता है कि एकनाथ शिंदे जैसा दावा कर रहे हैं वैसा कुछ नहीं है और यही वजह कि परदे के पीछे से खेल खेल रही भाजपा खुलकर सामने नहीं आ रही.

इस पूरे मामले में एकबात साफ़ नज़र आ रही है कि शिंदे या तो कच्चे खिलाड़ी हैं या फिर बहुत ज़्यादा आत्मविश्वासी और इसी कारण वह सत्ता की जगह पार्टी को हड़पने की गलती कर बैठे, शायद उन्हें लगा कि शिवसेना सिर्फ ठाणे में बस्ती है, वो यह भूल गए कि शिवसेना का मतलब ठाकरे परिवार है, जैसे कांग्रेस का मतलब गाँधी फैमिली, सपा का मतलब यादव परिवार। इन सब में शिव सैनिकों की बात तो थोड़ी अलग है क्योंकि कार्य और व्यवहार दोनों में उग्रता है, वहां हमेशा ठोको नीति चलती है, बागियों या विद्रोहियों की शिवसेना में कोई जगह नहीं, वहां उनका इलाज जैसे को तैसा की तर्ज़ पर किया जाता है. यह उद्धव ठाकरे हैं जिन्होंने बाला साहब की विरासत को अपनाया लेकिन अंदाज़ को नहीं और यही वजह कि वो इतनी बड़ी बगावत को भांप नहीं सके क्योंकि उन्हें अपनों पर भरोसा था और एकनाथ शिंदे उनके अपने थे.

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ऐसा नहीं कि महाराष्ट्र में कोविड के दौरान क्या खेल चल रहा था उनको इसकी बिलकुल खबर नहीं थी, शरद पवार ने भी उनको इशारे दिए थे. बताते हैं कि इसी बात को लेकर उद्धव ने शिंदे को बुलाकर इसके बारे में पूछा था और तब शिंदे रुंआसे होकर बोले थे कि आप इतना बड़ा आरोप लगा रहे हैं, शिंदे की इस एक्टिंग से प्रभावित होकर ही उद्धव ने उन्हें माफ़ करते हुए उन्हें विधान परिषद् चुनाव की ज़िम्मेदारी सौंपी थी और शिंदे ने इस मौके का फायदा उठाया और इतने विधायकों के साथ शिव सेना के इतिहास की सबसे बड़ी बगावत को अंजाम दिया. शिंदे के इस धोखे से उद्धव को बड़ा धक्का लगा और अब फ़िल्मी स्टाइल में पार्टी पक्ष प्रमुख ने बाला साहब का रूप धारण किया है. अब एक बात तो तय है कि शिंदे ने जैसा सोचा था वैसा नहीं होने वाला, लड़ाई अब अदालतों के परिसर तक पहुंचना लाज़मी हो चुकी है. किसी और के चक्कर में आकर शिंदे एक बड़ा पन्गा ले लिया है. मामला यहाँ शिवसेना का है, वरना आप ही सोचिये कि किसी और राज्य या किसी और पार्टी का मामला होता तो सारी कहानी अब तक ख़त्म हो चुकी होती, पार्टी वर्तय, सिम्बल विम्बल सबपर कब्ज़ा हो चूका होता है मगर सामने वो पार्टी है जिसका चुनाव चिन्ह तीर और कमान है और दहाड़ता शेर निशान है.

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