क्या बैकफायर कर गयी मोदी सरकार की अग्निपथ योजना

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तौक़ीर सिद्दीक़ी 

केंद्र की मोदी सरकार के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तीन दिन पहले जब सेना की भर्ती प्रक्रिया में बड़े बदलाव की घोषणा की और “अग्निपथ योजना” को लांच किया तो उस समय उनके चेहरे के हाव भाव कुछ अच्छे नहीं लग रहे थे, एक तनाव सा था उनके चेहरे पर. कहीं न कहीं वो आशंकित से लग रहे थे और मेरी यह कल्पना वाली आशंका सच साबित हुई, क्योंकि दूसरे ही दिन से इस योजना के विरोध की आग बिहार से जो भड़की वो आज देश के कई राज्यों में फैल चुकी है, न सिर्फ फैल चुकी है बल्कि हिंसक भी हो चुकी है, तेलंगाना में तो आज एक आंदोलनकारी की पुलिस की गोली से मौत भी हो गयी. अभी यह आग और कितनी भड़केगी और कितनों को जलायेगी कहा नहीं जा सकता लेकिन एक बात तो शर्तिया तौर पर कही जा सकती है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक और नाकामी है। पीएम मोदी का नाम सिर्फ इसलिए कि केंद्र की इस सत्ताधारी सरकार का हर फैसला सिर्फ और सिर्फ उनका होता है, उसका एलान भले ही किसी भी मंत्री के मुख से हो. नोटबंदी, GST, कृषि कानून की तरह अग्निपथ योजना भी ठीक वैसी ही है जैसे रात में सपना देखा और सुबह एलान कर दिया। और यही वजह कि देश का युवा उबाल मार रहा है। 

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मोदी सरकार की हर योजना की तरह इस योजना को भी ऐतिहासिक बताकर लांच किया गया, मगर इस ऐतिहासिक योजना पर पूरे देश का युवा ऐसी प्रतिक्रिया देगा सरकार को भी अनुमान नहीं था और यही वजह है कि सरकार ने इस योजना पर एक कदम वापस खींचा है और अग्निपथ योजना की अहर्ता आयु को दो साल बढाकर 21 से 23 वर्ष कर दिया है, सरकार दिखाना चाहती है कि उन्हें देश के युवाओं की कितनी चिंता है, बैकफुट का यह कदम उन अभ्यर्थियों के लिए है जो पिछले तीन सालों से रजिस्टर हैं और सेना में भर्तियां निकलने की राह देख रहे हैं जो पिछले दो सालों से कोविड के बहाने रुकी हुई हैं. दो वर्षों से कोई भी भर्ती न होने से इन अभ्यर्तीयों पर उम्र निकलने का खतरा मंडरा रहा है, सरकार ने ऐसे अभ्यर्थियों के लिए ही आयुसीमा में सिर्फ एक साल के लिए इस छूट का एलान किया है। 

लेकिन सवाल तो यह है कि पिछले कई वर्षों से ग्रामीण इलाकों में खेतों की पगडंडियों और सड़कों पर सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में जो नौजवान दौड़ते हुए सेना में जाने का सपना लेकर तैयारियां करते हुए नज़र आ रहे हैं वो क्या अग्निवीर बनने की तैयारी कर रहे थे , वह तो एक सम्पूर्ण सैनिक बनकर देश और अपना भविष्य बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे , वह तो सेना की उन वैकेंसीज की तैयारी कर रहे हैं जो सरकार हर साल निकालती है, वो युवा इन 46 हज़ार अग्निवीरों की तैयारी तो हरगिज़ नहीं कर रहे थे। अब ऐसे में वो भड़के ने तो क्या करे। युवा खून है अपना भविष्य उसे जब अन्धकार में जाता हुआ दिखाई देगा तो उसके हिंसक बनने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

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ज़रा कल्पना करके देखिये कि सेना में भर्ती का सपना देख रहे यह युवा अभी कितने उत्तेजित और आंदोलित हैं और जब इनमें से 75 फीसद चार वर्षों की सेवा के बाद एक बाद फिर बेरोज़गार होगा, फिर सड़कों पर नौकरियों के लिए भटकेगा और जब उसे कोई नौकरी नहीं मिलेगी तब वह कितना उत्तेजित और आंदोलित हो सकता है, और याद रखिये अब युद्ध कौशल में भी थोड़ा बहुत निपुण हो चूका होगा, सोचिये आज जब यह युवा इतना खतरनाक दिख रहा है तो चार साल बाद कितना खतरनाक हो सकता है, ज़िन्दगी बिताने के लिए तब वो किस राह पर चल निकले, किन गलत हाथों में पड़ जाय, आप इन आशंकाओं को निर्मूल नहीं ठहरा सकते। वैसे भी सेना में चार साल का कोई मतलब ही नहीं होता, न तो वो सही मानों में सेना का कौशल सीख सकता है और न ही वो एक अच्छा डिसिप्लिनड सैनिक बन सकता है। 

सरकार भले ही इस योजना के अनगिनत फायदे गिना रही है लेकिन पूर्व सैन्य अधिकारी ही इस योजना पर सवाल उठा रहे हैं. सरकार का कहना कि इनमें से 25 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी किया जायेगा, 75 फीसद को एकमुश्त इतना पैसा मिल जायेगा कि वह कोई रोज़गार शुरू कर सकते हैं, सरकार का मानना है कि 25-26 की उम्र में सेना से रिटायरमेंट के बाद जब वो वापस सिविल लाइफ में आएगा तो सेना का अनुशासन उसके काम आएगा जिससे समाज का भी भला होगा और प्राइवेट सेक्टर के अलावा राज्य सरकारें अपनी फोर्सों में उन्हें जगह देंगी। यह सब बातें अपनी जगह सही हैं लेकिन कौन से माँ बाप होंगे जो अपने बेटे को चार साल की नौकरी पर भेजना चाहेंगे। सरकार जितना पैसा देने की बात सरकार कर रही है इसका एक बड़ा हिस्सा तो वो अपने लाल की सेना में जाने की तैयारियों पर खर्च कर चुके होंगे और कौन सा नौजवान कुछ लाख के बदले भरी जवानी में अपने माथे पर रिटायर्ड अग्निवीर का ठप्पा लगवाना पसंद करेगा।

मोदी सरकार ने अग्निपथ और अग्निवीर जैसी शब्दावली का इस्तेमाल कर नौजवानों पर राष्ट्रवाद का आज़माया हुआ दांव ज़रूर खेला लेकिन लगता है कि इसबार राष्ट्रवाद का यह दांव उल्टा पड़ गया है, फिलहाल मोदी सरकार का पूरा प्रयास है कि अपनी अन्य ऐतिहासिक योजनाओं की तरह यह योजना भी फलीभूत कराये, वरना बैकफुट पर आना अब प्रधानमंत्री मोदी ने सीख लिया है, आयुसीमा बढाकर संकेत भी दे दिया है, अगर प्रधानमंत्री मोदी को लगा कि अग्निपथ पर बढ़ चुके इन भावी अग्निवीरों की आग उन्हें जला भी सकती है, अगर उन्हें लगा कि युवाओं का यह आंदोलन आने वाले चुनावों पर भारी पड़ सकता है तो कृषि कानून की तरह इस पर भी यू टर्न मारा जा सकता है।

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