रालोद-कांग्रेस का गठबंधन बन सकता है बड़ी चुनौती

उत्तराखंडरालोद-कांग्रेस का गठबंधन बन सकता है बड़ी चुनौती

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रालोद-कांग्रेस का गठबंधन बन सकता है बड़ी चुनौती

महागठबंधन में रालोद को अपेक्षित सीटें मिल पाना मुश्किल

दो ध्रुवीय यूपी चुनाव में तीसरा विकल्प बन सकता है यह गठजोड़

सुनील शर्मा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है और सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पासे फेंकने में जुट गये हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ एकजुट हो रहे विपक्षी दल गठबंधन का ऐलान करते जा रहे हैं। अभी तक का राजनीतिक समीकरण देखे तो समाजवादी पार्टी से जुड़ने वाले राजनीतिक दलों की संख्या अधिक है। लेकिन बात करें वेस्ट यूपी की तो यहां पर रालोद की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी। सपा मुखिया अखिलेश यादव यादव तो रालोद के साथ गठबंधन करने का ऐलान भी कर चुके हैं। वहीं सूत्रों के अनुसार रालोद को दी जाने वाली सीटों की संख्या भी तय की जा चुकी है। मगर रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी की तरफ से गठबंधन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि ना किए जाने से गठबंधन को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। तीनों कृषि कानून वापसी के ऐलान के बाद रालोद के लिये महागठबंधन में अपेक्षित सीटेें मिलना मुश्किल है। वहीं भाजपा और रालोद का साथ हो पाना भी दूर की कौड़ी नजर आ रहा है। ऐसे में तमाम दावों के बावजूद रालोद और कांग्रेस में गठबंधन होने की संभावना बरकरार हैं। उत्तर प्रदेश में फिर से राजनीतिक जमीन तलाश रहीं कांग्रेस और रालोद एक जैसे हालातों का सामना कर रही हैं। गठबंधन का पुराना अनुभव और बदले राजनीतिक समीकरणों के बाद पैदा हुई मजबूरी दोनों दलों को राजनीतिक गठजोड़ करने के लिये तैयार कर सकती है। यदि ऐसा हुआ तो दो ध्रुवीय हो चुके यूपी विधानसभा चुनाव में तीसरा विकल्प सामने आ सकता है। यह तीसरा ध्रुव सरकार भले ही न बना सके मगर उसके साथ के बिना सरकार बना पाना भी मुश्किल होगा। यह मौका कांग्रेस और रालोद के लिये राजनीतिक सफलता हासिल करने का सुनहरा अवसर बन सकता है।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से पराजय का सामना करने वाली राष्ट्रीय लोकदल को किसान आंदोलन के बाद संजीवनी मिल गई। चौधरी अजीत सिंह की मृत्यु के बाद मिली संवदेनाओं से जयंत चौधरी को जनसमर्थन मिला तो किसान आंदोलन ने उसे वेस्ट यूपी में उन्हें पुर्नगठित होने का अवसर प्रदान किया। जयंत चौधरी ने भी इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ताबड़तोड़ रैलियां कर संगठन को मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। एक समय ऐसा भी आया जब यह माना जा रहा था कि यदि उत्तर प्रदेश में सरकार बनानी है तो रालोद का साथ लेना ही होगा। रालोद भी अपनी मजबूत स्थिति को जानते हुए वेट एंड वाॅच की स्थिति में थी। पार्टी का यह मानना था कि किसानों के बीच पैठ बना चुकी रालोद को गठबंधन में अधिक सीटें मिलनी चाहिएं। अंदरखाने सीटों के बंटवारे को लेकर सपा और रालोद में चर्चाएं चलती रहीं मगर कोई फैसला नहीं हो पाया।
लेकिन जयंत चौधरी और प्रियंका गांधी की लखनऊ में हुई मुलाकात के बाद आनन-फानन में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रालोद के साथ गठबंधन करने की पुष्टि कर दी। माना जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर सपा और रालोद के बीच गठबंधन की आधिकारिक घोषणा की जा सकती है। मगर ऐन मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेकर रालोद से चुनावी मुद्दा छीन लिया। विवादित कृषि कानूनों के वापस लिए जाने के बाद किसानों का रुख भाजपा की ओर मुड़ने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं। ऐसे में रालोद की अब तक की उपलब्धियां बेमानी साबित होने का अंदेशा भी राजनीतिक गलियारों में मंडराने लगा और सपा-रालोद के बीच गठबंधन का अधिकारिक ऐलान नहीं किया जा सका।

एक और जहां सपा अन्य राजनीतिक दलों के समर्थन से मजबूत महागठबंधन बनाने की ओर बढ़ रही है। वहीं रालोद का अब किसानों को संगठन से जोड़े रखने में कामयाब होने पर संशय पैदा हो गया है। ऐसे में रालोद को महागठबंधन में शामिल होने के बाद अपेक्षित सीटें मिल पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है। वहीं रालोद के लिए भी असमंजस की स्थिति आ गई है। क्योंकि एक ओर जहां महागठबंधन में उसे आशा के अनुसार सीटें मिलती हुई नहीं दिख रही है वहीं रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष साफ तौर पर भाजपा के साथ जाने से इंकार कर चुके हैं। वहीं भाजपा के लिए भी जयंत चौधरी को साथ लेना खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार देने जैसा साबित हो सकता है। क्योंकि रालोद को यदि साथ दिया तो वेस्ट यूपी में पार्टी को सीटें देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ऐसा करने पर वेस्ट यूपी के जाट भाजपा नेताओं को नाराज होते हुए देर नहीं लगेगी। गौरतलब है कि वेस्ट यूपी में अनेक जाट नेता ऐसे हैं जिन्होंने अपने दम पर भाजपा को जीत दिलाई है। इन हालातों में रालोद का साथ लेकर विधानसभा चुनाव की बेला में अपने पुराने जाट नेताओं को नाराज करने का खतरा भाजपा नहीं उठाना चाहेगी।

पीएम मोदी के कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के ऐलान से पहले तक मजबूत स्थिति में दिख रही रालोद को भाजपा का सहारा मिलता हुआ नहीं दिख रहा। वहीं सपा भी अब उसे पहले जैसा भाव देने को तैयार नहीं दिखती। ऐसे में अधर में लटकी राष्ट्रीय लोकदल के लिए कांग्रेस का साथ एक बेहतर विकल्प हो सकता है। क्योंकि कांग्रेस की भी स्थिति उत्तर प्रदेश में रालोद के जैसी ही है। समाजवादी पार्टी या कोई अन्य बड़ा राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं दिख रहा। रालोद की तरह कांग्रेस भी वेस्ट यूपी में राजनीतिक आधार को तलाश रही है। कांग्रेस के लिए भी अपने दम पर यूपी में कोई बड़ी सफलता हासिल करना मुश्किल ही दिखता है। लेकिन रालोद और कांग्रेस का गठबंधन एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकता है। यह दोनों पार्टियां मिलकर सरकार तो शायद ना बना पाएं मगर एक मजबूत स्थिति में जरूर आ जाएंगीं। ऐसे में वह सरकार बनाने के लिए अपनी शर्ते भी रख सकते हैं। वही इस गठबंधन को मिली सफलता आगामी लोकसभा चुनाव में कामयाबी की नींव रख सकती है।

आने वाले दिनों में राजनीति का परिदृश्य किस तरह से बदलता है और कौन किसके साथ जाता है यह कहना तो अभी तो मुश्किल है। लेकिन अभी तक के हालत देखें तो एक जैसे हालातों का सामना कर रही कांग्रेस और रालोद का गठजोड़ ना सिर्फ एक-दूसरे के लिए सहारा बनेगा बल्कि दो ध्रुवीय हो चुके यूपी विधानसभा चुनाव को तीसरा विकल्प भी प्रदान करेगा। दोनों पार्टियों में गठबंधन कोई नया अनुभव भी नहीं होगा क्योंकि राजस्थान में भी कांग्रेस और रालोद एक साथ हैं। उसी कड़ी को उत्तर प्रदेश में भी आगे बढ़ाए जाने की संभावना बन रही है जो शायद दोनों ही दलों के लिए बेहतर अवसर साबित हो सकता है।

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