अमित बिश्नोई
यह बात तो सही है की सत्ता तो आनी जानी वाली चीज़ होती है. आज तुम्हारे पास तो कल हमारे पास. यह भी सही है कि पुलिस हो या प्रशासन, सब शासन के अंडर ही चलते हैं। यह भी सही है कि विपक्ष हमेशा सत्ता पक्ष पर सरकारी अमले का बेजा और ग़लत इस्तेमाल का इलज़ाम लगाता रहता है और यह भी सच है कि विपक्षी नेता कई बार इस मामले में हदें भी पार कर जाते हैं और इशारों इशारों में अफसरशाही को यह नसीहत भी देते हैं कि सत्ता बदलने वाली है, संभल जाओ. मगर AIMIM के प्रमुख और मुसलमानों के मसीहा बनने का सपना देखने वाले हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में आकर खुले आम पुलिस को धमकाने की हद तक पहुँच गए।
असदुद्दीन ओवैसी जिनकी पार्टी को सियासी जगत में अक्सर लोग बीजेपी की बी टीम मानते हैं, इन दिनों यूपी चुनाव को लेकर प्रदेश में डेरा डाले हुए हैं. मुसलमानों के मसीहा बनने की कोशिश में लगे असदुद्दीन ओवैसी आय दिन कुछ न कुछ विवादित बयान देते रहते हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध ध्रुवीकरण की राजनीति से होता है. उन्होंने हाल ही में कानपूर में एक भाषण के दौरान धमकी भरे अंदाज़ में कहा था कि याद रखो योगी हमेशा मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे. मोदी भी हमेशा पीएम नहीं रहेंगे. हम मुस्लिम आपका अन्याय भूलेंगे नहीं. हम यह अन्याय याद रखेंगे. चीजें बदलेंगी. तब तुम्हें बचाने कौन आएगा? जब योगी मठ चले आएंगे और मोदी वापस पहाड़ों में चले जाएंगे, तब कौन आएगा? ‘
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ओवैसी के इस बयान के बाद बवाल होना लाज़मी था, उनके इस बयान की सोशल मीडिया पर काफी निंदा हुई, बाद में ओवैसी ने अपने बचाव में ग़लतबयानी का घिसा पिटा दांव अपनाया। दरअसल ओवैसी की पूरी राजनीति ही विवादित बयानबाज़ी पर केंद्रित है जो उन्हें हमेशा चर्चा में बनाये रखती है. कभी वो हिंदू तीर्थयात्रियों को दी जा रही वित्तीय सहायता और सब्सिडी को खत्म करने की चुनौती देते हैं, तो कभी सपा-कांग्रेस अलायंस को दादरी-बाबरी का अलायंस बताते हैं तो कभी वह इस्लाम को ही सभी लोगों का घर बताते हैं और इस्लाम धर्म अपनाने वालों को घर वापसी कहते हैं. ऐसे ही अनगिनत बयान हैं जिन्हे ओवैसी हिन्दू और मुसलमान को बांटने के लिए देते हैं. ओवैसी का पुलिस अधिकारियों को धमकाने वाला बयान ठीक वैसा ही जैसा हरिद्वार की धर्म संसद में कुछ लोगों ने एक समुदाय धमकाने के लिए दिए. उन बयानों की अगर आप निंदा करते हैं तो ओवैसी का बयान भी निंदनीय है. एक लोकतान्त्रिक प्रणाली में इस तरह के बयानों की कोई जगह नहीं है।
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और फिर ओवैसी किस हैसियत से पुलिस अधिकारियों को धमका रहे हैं, क्या उनकी यूपी में यह हैसियत है, यूपी छोड़िये क्या उनके गृह राज्य में भी यह हैसियत है कि वह पुलिस को धमका सकें। असदुद्दीन ओवैसी या उनकी पार्टी की छवि एक वोट कटवा पार्टी की है, ओवैसी हमेशा कुछ मुस्लिम नौजवानों के जज़्बातों को भड़काकर अपनी हैसियत बढ़ाने की फ़िराक में रहते हैं. उनकी पार्टी की वैसे तो हैसियत कुछ है नहीं इसलिए हमेशा गठबंधन की बैसाखी ढूंढने में लगे रहते हैं ताकि उसके सहारे राजनीति की डगर पर कुछ और आगे बढ़ सकें। यूपी में गठबंधन के सारे प्रयास करने वाले ओवैसी को हर जगह निराशा ही हाथ लगी है, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा से कुछ दिनों का हनीमून था, वह भी खिसककर साइकिल पर सवार हो गए. अभी यूपी में असदुद्दीन ओवैसी की हालत घर की न घाट की जैसी हो चुकी है और फ़्रस्ट्रेशन में उनके मुंह से अब अनाप शनाप निकलने लगा है।
ओवैसी लाख कोशिश कर डालें पर यूपी में वह एक वोट कटवा से ज़्यादा कुछ साबित नहीं हो सकते। पश्चिम बंगाल के चुनावों में वहां के अल्पसंख्यक समाज ने उनको उनकी हैसियत दिखा दी, यूपी में भी उनका हश्र कुछ वैसा ही होने वाला है. अभी कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में उनके साथ जिन अतिउत्साही या कह सकते हैं धार्मिक रूप से कट्टर नौजवानों की जो भीड़ नज़र आ रही है, मतदान के समय यह कहीं और नज़र आएगी। बिहार या महाराष्ट्र में छिटपुट सफलता पाने वाले ओवैसी की यूपी में दाल गलने वाली नहीं. इसलिए मेरा असदुद्दीन ओवैसी को मशविरा है कि यूपी की पुलिस उलझने की कोशिश न करें वरना नेता तो आते जाते रहेंगे, पुलिस कहीं नहीं जाने वाली। हालाँकि एक बात हमेशा हैरान करती है कि इतने बड़बोलेपन और विवादित बयानों के बाद भी ओवैसी के खिलाफ सरकार कोई एक्शन नहीं लेती, शायद AIMIM को बीजेपी की बी टीम कहने की यही वजह है।

