नाराज दिख रही है यूपी की जनता
- किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा सरकार को याद दिलाएंगे किसानों से किए वादे
- किसान आंदोलन एक ट्रेनिंग थी, अब भी बताना पड़े कि वोट कहां देना है तो फिर ट्रेनिंग कमजोर मानी जाएगी
यूपी में विधान सभा चुनाव का माहौल है। ऐसे किसान एक बार फिर आंदोलन की बात कर रहे हैं। संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर 31 मार्च को वादाखिलाफी आंदोलन का ऐलान किया गया है। चुनावी माहौल में किसानों का विरोध क्यों? यह विरोध चुनाव पर कितना असर डालेगा, इस बार किसानों के मन में क्या है और पश्चिमी यूपी में सपा और आरएलडी का गठबंधन क्या गुल खिलाएगा? ऐसे ही मुद्दों पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने बिजनेसबाइट्स डॉट कॉम से बात की। पेश है ऊषा सिंह से राकेश टिकैत की बातचीत की खास बातें-
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सरकार को वादे याद दिलाएंगे
अभी तो 31 जनवरी को एक दिन का वादाखिलाफी आंदोलन रखा गया है। संयुक्त मोर्चा की कॉल पर पूरे देश में आंदोलन होगा। सभी जिलों में डीएम, कमिश्नर को ज्ञापन दिए जाएंगे। दरअसल जब 13 महीने चला आंदोलन शर्तों के साथ खत्म हुआ था। एमएसपी गारंटी कानून के लिए एक कमिटी बनाने की बात हुई थी। आंदोलन के दौरान जितने भी मुकदमे हुए, उनकी वापसी की बात हुई थी। इन वादों को सरकार पूरा कर दे। यही याद दिलाएंगे। लखीमपुर मुद्दा भी अहम है। वहां के पीड़ितों को मुआवजे और सरकारी नौकरी का भी वादा किया गया था।
टेनी नहीं हटे तो हम जनता के बीच जाएंगे
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र टेनी अब भी पद पर बने हुए हैं। उनको हटाने की भी हम मांग करेंगे। यदि सरकार नहीं हटाएगी तो हम फिर देश भर में जनता के बीच जाएंगे। चुनाव के बीच में भी जाएंगे और उसके बाद भी जाएंगे। जहां भी जाएंगे टेनी का नाम जरूर आएगा। हटाने का अधिकार तो हमारे पास नहीं है लेकिन अपनी बात जनता के बीच में कहने का अधिकार है तो है।
फेल है उज्ज्वला गैस योजना
हम राजनीति से बहुत दूर हैं। हां ये जरूर है कि हम जनता के बीच जाते हैं। वह नाराज दिख रही है। महिलाएं दूध का काम करती हैं। उन्हें रेट नहीं मिल रहे और चारा महंगा है। गैस का सिलेंडर महंगा है। औरतें जंगलों से लकड़ी बिनती हैं, उनसे रोटियां बनाती हैं। उज्ज्वला गैस योजना फेल हो गई है। जंगल कट रहे हैं। प्रदूषण बढ़ेगा। सोलर एनर्जी पर सब्सिडी देनी चाहिए। उस पर काम होना चाहिए। उस पर तो काम नहीं हो रहा। काम सिर्फ इस पर हो रहा है कि वोट कैसे मिलें? हमने तो 13 महीने आंदोलन चलाया। इस आंदोलन से जनता को इतना तो हो ही गया है कि अब क्या करना है और क्या नहीं करना? हमने तो शादी करवा दी। अब तुम आना-जाना करो। हम तो बिचौलिये हैं। अब बिचौलियों का काम खत्म हो गया।
आधे रेट पर फसल बेचकर वोट कहां देंगे, किसान समझ लेंगे
अब 13 महीने आंदोलन चलाकर हमको बताना पड़े कि क्या करना है? इसका मतलब है कि किसान ट्रेनिंग ठीक नहीं हुई। ये आंदोलन एक किस्म से ट्रेनिंग थी। कब किन परिस्थितियों हमको रहना है। किसकी जिम्मेदारी पर हम 13 महीने तक रहे? आधे रेट में फसल बेच कर वोट कहां देना है? यह बात किसान समझ गया है। मक्का, धान, गेहूं, जौ, धान और आलू के रेट नहीं मिल रहे। ऐसे में किसान किसको वोट देगा, खुद समझ लेगा।
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हम तो न्योता मांग रहे, बुला नहीं रहे
जहां तक सपा और आरएलडी गठबंधन की बात है तो इस देश में गठबंधन विचारधाराओं पर नहीं होता। वह सीटों पर होता है। तो हो गया गठबंधन। वैसे ठीक चलेगा इनका गठबंधन। वो सबको न्योता दे रहे हैं। हम तो न्योता मांग रहे हैं कि हमें बुलाओ। हमको बुला ही नहीं रहे।

