अजय राय आर्टिफिशियल कांग्रेसी, प्रियंका होती तो कुछ बात होती

आर्टिकल/इंटरव्यूअजय राय आर्टिफिशियल कांग्रेसी, प्रियंका होती तो कुछ बात होती

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अमित बिश्नोई
कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी को मात देने के लिए या फिर कहिये उन्हें घेरने के लिए अजय राय को एकबार फिर चुनावी मैदान में उतारा है। मोदी के खिलाफ वाराणसी से अजय राय ने तीसरी बार ताल ठोंकी है , या कह सकते हैं कि ठुंकवाई गयी है और इसके लिए अजय राय ने अपने शीर्ष नेतृत्व को धन्यवाद भी किया है. मोदी के खिलाफ पिछले दो चुनाव तो वो बहुत बड़े अंतर से हारे, अंतर इतना था कि उसका ज़िक्र करना ही बेकार है और अब एकबार फिर उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है, अब पता नहीं है कि वो खुद से शहीद होने के लिए तैयार हुए हैं या फिर उनपर शहीद होने के लिए दबाव डाला गया है. अजय राय पर अब डबल ज़िम्मेदारी है , प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनकी ज़िम्मेदारी उन सभी 17 लोकसभा सीटों पर बनती है जो गठबंधन में कांग्रेस पार्टी के हिस्से में आयी है. अब देखना होगा कि वो सिर्फ वाराणसी में सिमट कर रह जाते हैं या फिर राहुल और प्रियंका की मदद करने सभी 17 लोकसभा सीटों पर एक्टिव रहेंगे जिसमें एक सीट उनकी भी है.

आइये कुछ पड़ताल अजय राय की करते हैं तो अजय राय के राजनीतिक बैकग्राउंड की शुरुआत तो दक्षिणपंथी संगठन यानि ABVP से शुरू होती है. इसका मतलब है कि खुद को कट्टर सनातनी कहने वाले और बाबा भोलेनाथ के भक्त अजय राय नेचुरल नहीं आर्टिफीसियल कांग्रेसी हैं. ABVP के बाद स्वाभाविक है कि चुनावी राजनीति का सफर भाजपा से ही शुरू हुआ होगा। जी हाँ ये बात सही है कि प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष अजय राय 1996 से लेकर 2007 के बीच लगातार तीन बार भाजपा के टिकट पर कोलासला विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते। इसके बाद उनकी इच्छाएं महत्वकांक्षाओं में बदली और विधायक से सांसद बनने की पार्टी से इच्छा जताई जो पूरी नहीं हुई और फिर जैसा कि इस तरह की परिस्थितियों में होता है उनका भाजपा में दम घुटने लगा और फिर वहां से निकलकर वो समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. यानि गोडसेवादी से सीधे लोहियावादी।

अजय राय साहब ने 2012 में कांग्रेस का रुख किया और पिंडरा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक बन गए । लेकिन 2017 में वो कांग्रेस के ही टिकट पर यहाँ से हार गए. अबतक अजय राय कट्टर दक्षिण पंथी से कट्टर कांग्रेसी बन चुके थे यही वजह है कि उन्हें मोदी का मुकाबला करने के लिए चुना गया और लगातार चुना गया, इस बार भी चुना गया. वैसे तो वो लगातार चार चुनाव हार चुके हैं लेकिन उसमें दो विधानसभा चुनाव की हार भी शामिल है लेकिन इस बात की पूरी उम्मीद है कि उनकी लोकसभा चुनाव में हार की हैटट्रिक ज़रूर पूरी होगी। हालाँकि चुनाव से पहले और नतीजे आने से पहले किसी भी नतीजे के बारे में भविष्यवाणी नहीं करनी चाहिए लेकिन कुछ इबारतें दीवार पर साफ़ तौर पर लिखी होती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले अजय राय कहाँ ठहरते हैं ये राजनीति से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है, माना की वो लोकल बॉय हैं लेकिन वाराणसी के लिए पीएम मोदी इन सब बातों से बहुत बड़े हैं. अच्छा तो ये होता कि वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला करने के लिए गाँधी फैमिली से किसी को आगे आना चाहिए था. अजय राय तो एक वाक ओवर हैं। हो सकता है कि गठबंधन की वजह से उन्हें सपा का भी कुछ वोट मिल जाय और उन्हें पहले के मुकाबले कुछ ज़्यादा वोट मिल जांय, बस इससे ज़्यादा और कुछ नहीं। वाराणसी से प्रधानमंत्री को हराया तो नहीं जा सकता, कम से कम अभी तो नहीं, हाँ अगर प्रियंका गाँधी इस सीट से मैदान में उतरती तो मुकाबला कुछ बनता। हम ये नहीं कहते कि प्रियंका गाँधी प्रधानमंत्री मोदी को हरा सकती है लेकिन प्रधानमंत्री को वाराणसी तक घसीटने में कामयाब ज़रूर रह सकती हैं। हार जीत तो होती ही रहती है, जब लड़ोगे तभी तो जीतोगे, जब लड़ोगे ही नहीं तो जीतोगे क्या ? केजरीवाल ने 2019 में मोदी जी को चैलेन्ज दिया, हार गए तो क्या हुआ. चुनाव में हार से नेता डरने लगा तो वो कभी चुनाव लड़ ही नहीं सकता। वाराणसी में मोदी जी की जीत में संशय नहीं है लेकिन अजय राय की जगह अगर प्रियंका चेहरा होती तो मोदी को शायद रिकॉर्ड मार्जिन से जीत न मिलती। मोदी जी का कम अंतर से जीतना ही एक तरह से उनकी हार होगी और विपक्ष की जीत लेकिन इसके लिए जिगर चाहिए, हार से न डरने वाला जिगर। क्या प्रियंका में है वो जिगर?

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