- नवेद शिकोह
देश संकट मे है। कोरोना संक्रमण का क़हर इतना फैल गया है कि इलाज करने वाले डाक्टर भी संक्रमित होते जा रहे हैं। फिक्र है कि अब इलाज कैसे होगा ! डाक्टर तो बेचारे इलाज करने का अपना फर्ज निभाते हुए बीमार हो गये लेकिन तमाम पेशेवर गैर जिम्मेरारी की बीमारी में बीमार नज़र आ रहे हैं।
इस कठिन लड़ाई लड़ने के लिए जिसकी जितनी जिम्मेदारी है वो उतना ही गैर जिम्मेदार नजर आ रहा है।
इस चुनौतीपूर्ण वक्त में सरकार चुनाव करवा रही है। जनता भी इतनी गंभीर नहीं दिख रही जितना संजीदा उसे होना चाहिए है।
कोरोना अदृश्य है, ये दिखता नहीं लेकिन इसका दूसरा भयावह रूप चेहरों पर नजर आने लगा है। ख़ासकर टीवी मीडिया के चेहरे पर ग़ैर जिम्मेदाराना कोरोना दिख रहा है। संक्रमण से हम कैसे बच सकते हैं, कोरोना प्रोटोकॉल का पालन क्यों करना है और ये कितना जरूरी है। कौन सी लापरवाही हमें मौत के मुंह में डाल देगी। क्या हालात हैं ! इन तमाम सूचनाओं के जरिए आम जनता को जागरुक और आगाह करने का फर्ज निभाने की जिम्मेदारी के बजाय नब्बे प्रतिशत टीवी न्यूज़ चैनल चुनावी बहस में मसरूफ हैं। जबकि मीडिया को ये सवाल भी उठाना चाहिए था और ये दबाव बनाना चाहिए था कि फैलते संक्रमण और विकराल रूप लेती महामारी में चुनाव क्यों कराए जा रहे है।
बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता चुनावी रैलियों में भीड़ इकट्ठा करके लोगों की जिन्दगी से क्यों खेल रहे हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुझे मीडिया खराब सिस्टम के इलाज की जिम्मेदारी भी निभाता है। लेकिन यहां भी इलाज करने वाले गैरजिम्मेदारी की बीमारी का शिकार हो गए हैं। हमारे राजनेता एक तरफ कोरोना के बुरे हालात से वाकिफ करा रहे हैं। कह रहे हैं कि जनता की लापरवाही ने भी ये हालात पैदा किए हैं। दूसरी तरफ ये ही नेता संक्रमण के वेब में चुनावी रैलियों की भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं। हैरत में डालने वाली इस गंदी सियासत पर सवाल करने के बजाए टीवी चैनल्स सुबह से रात तक पश्चिम बंगाल की चुनावी कवरेज में पसीना बहा रहे हैं। जनता महामारी में मरे या जिए पर टीवी मीडिया के लिए चुनाव में जीत और हार पर डिबेट चल रही है।
बुरा वक्त सच्चाइयों से वाक़िफ करता है। सच का आईना दिखाता। है। अपने और पराए में फर्क बताता है। कौन जिम्मेरार है और कौन गैर जिम्मेरार ये.हक़ीकत बयां करता है।
देश की जनता का बेहद बुरा वक्त चल रहा है। आम इंसान एक साल झेला, जिन्दगियां गईं, नौकरियां गईं। महंगाई की मार झेल रहा आम इंसान एक वर्ष की कोरोना की मार के बाद दोबारा खड़ा होने की कोशिश कर रहा था कि पहले से भी ज्यादा विकराल रूप में कोविड कहर बनकर देश को घेरने वापस आ गया। जीवन और रोजी-रोटी छीनने वापस आये कोरोना की वेब में मीडिया को पहचानने का यही सही वक्त है। आजतक मीडिया इतना गैर जिम्मेरार नहीं हुआ। ज्यादातर टीवी पर चुनावी डिबेट और चुनावी रैलिया दिखाई जा रही हैं और स्क्रीन के पांच प्रतिशत नीचे के हिस्से की एक पट्टी (स्क्रोल) पर कोरोना संक्रमण की बढ़ती तादाद का क़हर और बढ़ती मौतों का आकड़ा चल रहा है। यानी टीवी मीडिया के लिए आम जनता का स्थान पांच प्रतिशत है और 95 फीसद अहमियत वो अपने सियासी आकाओं की सियासत को देते हैं।
अब ग़ौर कीजिए और तय कीजिए कि ऐसी 90 फीसद मीडिया का बॉयकाट करना है। और उन दस प्रतिशत मीडिया को अपना मानना है जो सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता कर रहे हैं। वही पत्रकारिता सच्ची है जो सबसे बड़े कोरोना संकट की सबसे बड़ी कवरेज दिखाकर कोरोना से जनता को बचाने में अपनी भागीदारी निभा रही हैं।

