आम तौर पर भाजपा अपने उठाये गए क़दम से पीछे नहीं हटती, मगर बात अगर चुनाव की हो तो यू टर्न लेने से परहेज़ भी नहीं करती, तीन विवादित कृषि कानून वापस लेना इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं. वहीँ अब गुजरात में चुनाव नज़दीक आ गए हैं ऐसे में गुजरात की भाजपा सरकार या मोदी जी की सरकार के बहुत महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट तापी-नर्मदा लिंक परियोजना का रद्द किया जाना भी उसी क्रम की एक कड़ी है.
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चूंकि इस परियोजना से आदिवासी बहुत नाराज़ थे और आदिवासी गुजरात की 180 में 27 सीटों पर सीधा प्रभाव रखते थे इसलिए इस प्रोजेक्ट के रद्द होने से किसी को कोई हैरानी नहीं हुई, सभी को मालूम था कि जब मोदी सरकार तीन कृषि कानून यूपी चुनाव के लिए रद्द कर सकती है तो तापी-नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट का रद्द होना तो स्वाभाविक था.
दरअसल आदिवसियों पर अभी तक कांग्रेस पार्टी का प्रभाव चला आ रहा है, इन 27 में से 15 सीटें उसने पिछली बार भी जीती थीं, भाजपा इस बार कांग्रेस के इस वोटबैंक में सेंध लगाना चाहती है ताकि वह अपने 150+ के लक्ष्य को पूरा कर सके. इसलिए इस बार उसका पूरा ज़ोर कांग्रेस पार्टी से उसके परंपरागत वोट बैंक को छीनने पर है. भाजपा के अलावा इस बार आम आदमी पार्टी भी इसी वोट बैंक के सहारे गुजरात में अपनी ज़मीन तैयार करना चाहती है ताकि इस बार न सही तो अगली बार भाजपा के मुकाबले में कांग्रेस की जगह वो ले सके.
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बात अगर इस प्रोजेक्ट की करें तो इसकी वजह से बनने वाले बाँध से एक तो आदिवासियों को बड़ी संख्या में पलायन करना पड़ता , इसके अलावा 60 से ज़्यादा गांवों के डूबने का खतरा था. आदिवासियों में इसी बात को लेकर नाराज़गी थी कि उसके जल जंगल और ज़मीन को सरकार उससे ज़बरदस्त छीन रही है. अगर गुजरात में चुनाव न होते तो क्या इतनी आसानी से एक प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल इस परियोजना को रद्द करने का एलान करते, यह एक बड़ा सवाल है.

