जो काम एक अकेला व्यापारी कर सकता है उसको किसान वर्ग मिलकर क्यों नहीं !

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देश को पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया। पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के मसीहा चौधरी चरणसिंह ने देश-व-पेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसान को सोंपने का प्रस्ताव रखा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी भी न देकर उसके हाल पर छोड़ दिया। सवाल है कि क्या आज किसान के पास भूखा मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं? रास्ता है जो आपसी सहयोग व हौसले से बनाना होगा। किसान सभी उत्पादकों की तरह अपने उत्पाद की कीमत स्वयं तय करे और उसे खुले बाजार में बेचे। आपके पास तो अन्न है सभी खरीदने आएंगे और धड़ल्ले से बिकेगा। 

हालाकि परेशानी अनाज के भंडारण की है लेकिन यह कोई असंभव कार्य नहीं है। ब्लॉक स्तरों पर छोटे जबकि जनपद स्तरों पर बड़े भंडारण बनाकर, इसका प्रबंधन किसान वर्ग द्वारा गठित सहकारी समितियां द्वारा हो सकता है। जो काम अकेला एक व्यापारी कर सकता है? तो क्या समस्त किसान वर्ग नहीं कर सकता? यही किसानों के लिए चेलैंज है और इसी सहयोग में किसान का भविष्य सुरक्षित है। किसान युवाशक्ति को चाहिए कि वह क्षमता, ईमानदारी और परिश्रम से इस बीड़े को उठाए और वह करके दिखाए। जिसकी किसी ने कल्पना न की हो। यह किसान-जवान द्वारा उद्यमी जगत के लिए क्रांतिकारी मिशाल होगी। जो आगे चलकर देश की सुरक्षा के लिए आधुनिक आयाम सिद्ध होगा और साथ में होगा एक  वृहत-स्वरोजगार-निर्माण। इसका बड़ा उदाहरण देश में दूग्ध-क्रांति लाने वाले डाक्टर कुरियन वर्गीस द्वारा दूग्ध उत्पादन के क्षेत्र में ऐसा प्रयोग सफल हो सकता है तो कृषि में क्यों नहीं हो सकता? आवश्यकता है अधिक इच्छा शक्ति व प्रतिबद्धता की। जो किसान धरती का सीना चीरकर अन उगाता है। वह यह प्रयोग करने में सौ फ़ीसदी सफल हो सकता है।

देश के जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री रहे सोमपाल शास्त्री कहते हैं कि कृषि संबंधी नीतियां बनाने में किसानों को आगे आना चाहिए। जिससे नीतिगत खामियों और मंडी समिति की त्रुटियां दूर हो सके। सरकार किसानों को सॉइल कार्ड दे देती है, लेकिन उस से क्या होगा, किसानों को समाधान चाहिए। सर्वविदित है कि देश में किसानों के पास उपज को रखने की क्षमता नहीं होती है। जब उनकी फसल आती है तभी बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वे अपनी उपज के बदले अधिक कीमत मांगने की स्थिति में भी नहीं होते हैं। 

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इस में कोई दो राय नहीं है कि देश के 70 फ़ीसदी नेता किसान और ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। फिर भी वे किसानों के हितों के लिए कोई काम ना करके केवल  जेबें भरने में लगे रहते हैं। वैसे उन्हें खेती किसानी की समस्याओं के बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं होती है।  सरकारी अधिकारी जो फाइल लेकर आ जाते हैं, वे हस्ताक्षर कर देते हैं। वे यह नहीं सोचते कि उस पर अमल होगा या नही। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 15 से 16 प्रतिशत बताया जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि यह अनुपात कृषि उपज की कम कीमतों के कारण ही है। अगर उपज सही कीमत हो तो जीडीपी में कृषि का योगदान 30 फ़ीसदी से कम नहीं होगा।

सवाल यह उठता है कि किसानों को मिलने वाली कीमत और उपभोक्ताओं से वसूली जाने वाली कीमत में अंतर की ओर कभी सरकारों का ध्यान क्यों नहीं जाता। सरकार इसके लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती है। जानकारों का कहना है कि इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कृषि नीतियां बनानी चाहिए और सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि उसमें कृषि विशेषज्ञ और किसानों को शामिल किया जाना चाहिए जिससे सभी के विचारों और सुझावों के बाद अच्छी कृषि नीति देश में बन सके। आज देश में केन्या, कनाडा जैसे देशों से दालों का आयात कंपनियां जिस कीमत पर कर रही हैं उपभोक्ताओं को उससे कई गुना अधिक दामों पर बेचती हैं। 

इसलिए किसानों को उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए कृषि संबंधी नीतियां बनाने को सरकार पर दबाव बनाने की आवश्यकता है। किसानों को चाहिए कि वें सरकार पर नीतिगत खामियों को सुधारने और मंडी समिति की त्रुटियां दूर के लिए सरकार पद दबाव डाले।

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