उड़ते हुए गुलाल के बीच कहीं औरतें मर्दों पर बरसाती हैं लाठी डंडे तो कहीं कपड़ों को फाड़ कर एक दूसरे को रंगों में डुबो कर दोगुनी हो जाती है होली की मस्ती। कहीं रंगों में भीगे कोड़े बरसते हैं तो कहीं टेसू के फूलों की होती है बारिश। कहीं होली के जुलूस में होली का सुरूर चढ़ता है तो कहीं एक दूसरे पर कीचड़ फेंक कर होली (Holi Special 2022) की रस्म पूरी होती है। होली के यह कई अनोखे रंग देखने को मिलते है देश के अलग – अलग प्रातों में। सदियों से चली आ रही होली की इन दिलचस्प परम्पराओं को देखने के लिए देश ही नहीं विदेश से भी लोग आते हैं। होली के कुछ अनोखे रंगों को हम लेकर आएं हैं आपके लिए।
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दिन भर पानी में भीगते हैं कोड़े

अजमेर से 55 किमी दूर स्थित भिनाय गांव की कोड़ामार होली मशहूर है। इस गांव को दो हिस्सों में बांटने वाले बाजार में यह कोड़ामार दंगल होता है। इसे देखने के लिए दूर दूर से लोग जमा होते हैं। होलिका दहन (Holika Dahan) के दूसरे दिन सुबह रंग गुलाल खेलने के बाद शाम को मुख्य बाजार में कोड़ा मार दंगल होता है। इसमें रस्सी से बने कोड़ों को तैयार करके दिन भर पानी में भिगोया जाता है। पानी से निकलने के बाद लाठी की तरह तैयार हुए कोड़ों को लेकर लोग सिर पर साफा बांधते हैं और एक दूसरे पर कोड़े बरसाते हैं। खेल शुरू होने से पूर्व भैरूजी की स्थापना कर ज्योत की जाती है। ढोल की थोप, बांकिए की धुनों पर दोनों दलों का उत्साह व जोश बढ़ाया जाता है। एक दूसरे को ललकारते हुए खेल शुरू होता है।
कोड़े के प्रहार को देख दर्शक जोशीले नारे लगाते हैं। एक पक्ष चौक तो दूसरा पक्ष कावडिय़ा दल होता है। एक दूसरे को दुश्मन मानते हुए लड़ते हैं और खेल के बाद आपस में प्रेम व सौहार्द के साथ मिलते हैं और भाईचारे के साथ मेल-मिलाप करते हैं। यहीं खेल होली के तीसरे दिन शाम को भी खेला जाता है। बुजुर्गों के अनुसार गांव में बरसों पूर्व राजा-रानी के अलग-अलग दल के रूप में यह दंगल होता था। एक पक्ष में राजा व दूसरे पक्ष में रानी होती थी। बरसों से यह परंपरा आज भी कायम है। यह खेल पीढ़ीदर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।
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होली पर डंडे से पीटा जाता है पुरुषों को

बरसाना की लट्ठमार होली Holi देश में ही नहीं विदेश में भी प्रसिद्ध है। ये होली ( Holi Special 2022) फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंद गांव के लोग होली खेलने के लिए राधा के गांव बरसाने जाते हैं और बरसाना गांव के लोग नंद गांव में जाते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। जब नाचते, झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते हैं, लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना, पीटना हंसी-खुशी के वातावरण में होता है।
बृज के मंदिरों में प्राकृतिक रंगों से खेलते हैं होली

बृज में होली (Braj ki Holi) वसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण तक मनाई जाती है। बृज की होली देशभर में प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिए बाहर से लोग आते हैं। बृज में खेली जाने वाली होली Holi में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य होली की झलक मिलती है। यही वजह है कि हर साल हजारों लोग ब्रज मंडल में इकट्ठा होते हैं। ब्रज की होली में प्रेम और भक्ति के रंग चारों तरफ बिखरे दिखाई देते हैं। ब्रज में खेली जाने वाली होली में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। और टेसू के फूलों की बारिश यहां से यहां का माहैाल और भी खुशनुमा बन जाता है।
गीतों के बीच कपड़ा फाड़ होली

बिहार में होली को फाग या फगुआ भी कहते हैं। बिहार में होली Holi के मौके पर गाये जाने वाले फगुआ की अपनी गायन शैली के लिए अलग पहचान है। राज्य में कई स्थानों पर कीचड़ से होली खेली जाती है तो कई स्थानों पर कपड़ा फाड़ होली खेलने की भी परंपरा है। होली के दिन रंग से सराबोर लोग ढोलक की धुन पर नाचते है और लोकगीत गाते हैं।
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वराह घाट और ब्रह्म चौक की होली Holi

राजस्थान के शहर पुष्कर की पहचान या तो उसकी संस्क्रति से है या फिर वहां की होली से। हर साल होली के दिन यहां देश विदेश से लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं। यहां के वराह घाट और ब्रह्म चौक पर हुए मुख्य आयोजन किए जाते हैं, जहां विशेष तौर पर भीड़ देखी जा सकती है। इन दोनों ही जगहों पर आपको स्थानीय निवासी यहां आए पर्यटको के साथ होली खेलते नजर आते हैं। यहां भी होली के मौके पर कपड़ा फाड़ होली खेलने की परम्परा चली आ रही है। यह अंदाज न सिर्फ देश बल्कि विदेश में खासा लोकप्रिय है। यहां स्थानीय लोगों के साथ विदेशी पर्यटक रंग और गुलाल के साथ जमकर होली खेलते हैं। इस दौरान कपड़े फाड़ने की एक अनूठी होड़ मचती है। इसके नजारे देखने के लिए लोग सुबह से ही अपने घरों की छतों पर बैठ जाते हैं।
मुस्लिम भी लेते हैं बढ़ चढ़ कर हिस्सा
अवध और खासकर लखनऊ में होली का लंबा सिलसिला चलता है, जो वसंत पंचमी से शुरू होता है। नुक्कड़ों पर इसी दिन होलिका दहन (Holika Dahan 2022) के लिए रेंडी के पेड़(खंभ) गाड़े जाते हैं। फिर धीरे-धीरे लकड़ियां जमा की जाती हैं। यह किसी अकेले के जिम्मे नहीं होता। इसमें हर घर की हिस्सेदारी होती है। इस तैयारी में गंगा-जमुनी तहजीब भी साकार होती है। कई इलाकों में तो सारा दारोमदार मुस्लिम तबके के लोग उठाते हैं। लखनऊ का चौक तो होलियारों के लिए जन्नत जैसा है। होली के दिन यहां जुलूस निकाला जाता है तो शाम को मेला लगता है। फिर अगले दिन चकल्लस(कवि सम्मेलन) होता है। वरिष्ठ साहित्यकार अमृतलाल नागर की गंगा-जमुनी परंपरा को जीवंत रखते हुए यहां जगह-जगह होलिका दहन भी किया जाता है।

