बाजार:- सरकार ने निजीकरण के पुल पर पांव रख दिया है। सरकार का उद्देश्य सरकारी कम्पनियों का विलय प्राइवेट कम्पनियों के साथ करके आय के संसाधनों में वृद्धि करना और रोजगार के सुचारू संसाधन उपलब्ध करवाना है। लेकिन सरकार की निजीकरण की नीति इस समय मंद हो गई है और अभी सरकार का लक्ष्य अलग-अलग सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSE) में अपनी हिस्सेदारी की बिक्री के माध्यम से 65,000 करोड़ रुपये जुटाना है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सरकार की निजीकरण योजना क्या है और सरकार निजीकरण की नीति पर इतना जोर क्यों दे रही हैं वही सरकार के प्रयास के बावजूद भी यह निजीकरण की नीति स्लो क्यों चल रही है।
तो आइए जानते हैं निजीकरण का पूरा मामला….
जाने क्या है केंद्र का निजीकरण प्लान :-
निजीकरण के जरिए सरकार सभी सरकारी सेक्टर को प्राइवेट सेक्टर से जोड़ने की तैयारी में है। वही अगर हम इसको डीटेल्स में समझे तो सरकार अपनी पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइजेज (पीएसई) नीति के तहत, सरकार की योजना प्राइवेट निवेश के लिए सभी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSU) को खोलने, गैर-रणनीतिक समझे जाने वाले क्षेत्रों से पूरी तरह से बाहर निकलने और कम से कम एक पीएसयू को उन क्षेत्रों में रखने की है जिन्हें वह स्ट्रेटेजिक मानते हैं।
यह सरकारी कम्पनी लगी है निजीकरण की कतार में:-
भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (BPCL), शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ इंडिया, एचएलएल लिमिटेड, बीईएमएल लिमिटेड, प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड, फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड सहित कई लाभ कमाने वाली कंपनियां प्राइवेटाइजेशन के लिए कतार में हैं। सरकार ने आईपीओ, एफपीओ या फिर कंपनियों की बिक्री के लिए प्रस्ताव के माध्यम से भी इक्विटी बेचने का टारगेट रखा है।
जाने क्यों हो रही है निजीकरण में देरी:-
सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार कोरोना महामारी के वैश्विक प्रभाव के कारण निजीकरण होने में देरी हो रही है। निजीकरण न होने का सबसे अमुख कारण देश की अर्थव्यवस्था का पटरी से डगमगाना और महंगाई की गाज आम आदमी पर गिरना भी है।

