हर विद्यालय को 46 किलो भूसा जुटाने का निर्देश; टीचरों का सवाल— पढ़ाएं या गोशालाएं चलाएं?
बरेली। बरेली में बेसिक शिक्षा विभाग का एक आदेश विवादों में घिर गया है। बेसहारा गोवंश के लिए भूसा जुटाने की जिम्मेदारी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर डालने के बाद पूरे जिले में नाराजगी बढ़ गई है। आदेश के तहत हर स्कूल को लगभग 46 किलो भूसा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, जबकि प्रत्येक ब्लॉक से 100 क्विंटल भूसा जमा करने का लक्ष्य तय किया गया।
विभागीय निर्देश के अनुसार यह भूसा संबंधित खंड विकास अधिकारी या पशु चिकित्सा अधिकारी कार्यालय में जमा कराया जाना था। साथ ही भूसा खरीदने की रसीद भी कार्यालय में जमा कराने को कहा गया, ताकि इसकी निगरानी की जा सके। आदेश में यह भी चेतावनी दी गई कि लापरवाही मिलने पर संबंधित शिक्षकों और विद्यालयों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है।
यह आदेश सामने आते ही शिक्षक संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। शिक्षकों का कहना है कि वे पहले ही जनगणना, बीएलओ ड्यूटी, चुनाव कार्य और अन्य सरकारी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। ऐसे में उन पर भूसा इकट्ठा करने जैसी जिम्मेदारी डालना अनुचित है।
यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन (यूटा) के पदाधिकारियों ने इसे शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ बताया। संगठन के नेताओं ने कहा कि शिक्षक शिक्षा देने के लिए नियुक्त किए जाते हैं, न कि चारा व्यवस्था कराने के लिए। एक शिक्षक नेता ने तंज कसते हुए कहा, “आज भूसा जमा कराने का आदेश दिया जा रहा है, कल गोबर उठाने की जिम्मेदारी भी थोप दी जाएगी।”
सोशल मीडिया पर वायरल हुए आदेश के बाद मामला प्रशासन तक पहुंचा। डीएम अविनाश सिंह ने कहा कि बेसहारा गोवंश की देखभाल सरकार की प्राथमिकता है और हर ब्लॉक में भूसा बैंक बनाए जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस विशेष आदेश की जानकारी होने से इनकार किया। उन्होंने लोगों से स्वेच्छा से गौशालाओं में भूसा दान करने की अपील जरूर की।
विवाद बढ़ने पर नवाबगंज के खंड शिक्षा अधिकारी सत्यदेव ने सफाई देते हुए कहा कि शुरुआती निर्देश सख्ती के साथ जारी किए गए थे क्योंकि पालन नहीं हो रहा था, लेकिन बाद में इसे स्वैच्छिक कर दिया गया। उन्होंने कहा कि किसी शिक्षक पर दबाव बनाने का उद्देश्य नहीं था।
फिलहाल यह मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। शिक्षक संगठन साफ कर चुके हैं कि यदि भविष्य में ऐसे आदेश जारी हुए तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।

