लखनऊ में भी पुलिस फल विक्रेता का तराजू-बाट उठाकर ले गयी थी
मेरठ। मेरा तराजू रहने दीजिये साहेब, कई दिनों से काम नहीं है। आज ही ठेला लगाया है अभी तो कुछ कमाया भी नहीं है। यह गुहार लगाता रह गया ठेले वाला मगर वर्दी वाले साहब ने एक न सुनी। ठेले वाले के तराजू उठाकर फैंटम वाले को दे दिये और कहा, जाओ, थाने में ले जाकर रख दो। छतरी वाले पीर के सामने ठेले वाले की फरियाद गूंजती रही मगर साहेब के कानों तक शायद न पहुंच सकी। अब बिना तराजू के ठेले वाला कैसे सामान बेचता तो वह भी मन मसोसकर थाने की ओर चल दिया।
मेरठ में छतरी वाले पीर के सामने ठेला लगाने वाले का तराजू पुलिस वालों द्वारा उठाकर ले जाने का मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बना रहा। लोगों का कहना था कि लाॅकडाउन की मार सबसे अधिक गरीब आदमी पर पड़ी है जो रोज कमाकर ही रोज खा पाता है। यदि ठेले वाले से कोई गलती हुई भी थी तो उसे समझा कर या डांट-डपट कर छोड़ देना चाहिये था। मगर तराजू उठाकर थाने ले जाना इंसानियत नहीं है।
गौरतलब है कि बीते शनिवार को लखनऊ के 1090 के चैराहे के पास ठेले पर फल बेचने वालेे दीपू पर पुलिसिया कहर टूटा। डालीबाग चैकी प्रभारी सुरेंद्र सिंह ने दुकानदार का बाट और तराजू जबरदस्ती छीन लिया था। दुकानदार दीपू चैकी इंचार्ज के आगे गिड़गिड़ाता रहा मगर दरोगा उसे दुत्कारते हुए उसका तराजू, बाट लेकर चलता बना। ये मामला सोशल मीडिया पर हाइलाइट होने के बाद हजरतगंज थाना प्रभारी पीड़ित फल विक्रेता के घर पहुंचे और उसे एक इलेक्ट्राॅनिक तराजू देकर पुलिस के व्यवहार पर माफी मांगी थी। लेकिन मेरठ में भी ऐसी ही घटना दोहराये जाना साबित करता है कि चाहे लखनऊ हो या मेरठ, यूूपी पुलिस का बर्ताव सभी जगह एक सा ही है।

