अमित बिश्नोई
दो दिन पहले तक गुजरात में सरकार बनाने का डंका पीटने वाले अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी मनीष सिसोदिया के सुर अचानक बदल गए हैं अब उनका मानना है कि एग्जिट पोल्स में आम आदमी पार्टी को जो वोट प्रतिशत दिखाई दे रहा वो बड़ा उत्साहवर्धक है. एक नए राज्य में जाकर किसी नई पार्टी को इतने प्रतिशत मत मिलना बड़ी बात होती है. एग्जिट पोल्स के अनुमानों के बाद अब केजरीवाल सीटों की बात नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब यह मान लिया जाय कि केजरवाल ने गुजरात में अपनी हार को स्वीकार कर लिया है. जहाँ तक हिमाचल प्रदेश के चुनावों की बात है तो केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने मान लिया है कि वहां कुछ नहीं मिलने वाला। दोनों नेताओं ने कहा कि हिमाचल में उनके साधन सीमित थे.
केजरवाल ने आज एक तरह से यह भी मान लिया है कि दोनों राज्यों में उनकी हालत वोट कटवा जैसी है, क्योंकि सरकार बनाने के दावे करने वाला जब सीटों की भी बातें करना बंद कर दे और सिर्फ मत प्रतिशत की बातें करने लगे तो उसका मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि उसकी पार्टी की हैसियत वोट कटुवा जैसी है. आपको बता दें कि दुसरे चरण के चुनाव प्रचार के अंतिम दिन केजरीवाल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में यह लिखकर दिया था कि आम आदमी पार्टी सौ प्रतिशत सरकार बनाने जा रही है. उन्होंने उस पत्रकार वार्ता में यह भी कहा था कि सिर्फ 10 मिनट बात करने पर भाजपा का वोटर AAP को वोट देने की बात करने लगता है, यह भी कहा था कि कांग्रेस का वोटर गुजरात में ढूंढें से भी नहीं मिल रहा है.
तो बात फिर वही आती है कि आप किसी और को फेंकू महाराज कैसे कह सकते हैं जबकि फेंकने में इसबार आप उनसे कहीं आगे निकल गए. आपने जितने वादे, जितनी गारंटियां गुजरात के लोगों को देने की बात कहीं, भाजपा ने उसका एक हिस्सा भी अपने संकल्प पत्र में नहीं कहा, हालाँकि भाजपा भी वादे करने में एक्सपर्ट है. लेकिन बावजूद इसके उसने अपनी पुरानी पार्टियों पर ही भरोसा जताया है, एग्जिट पोल्स के मुताबिक गुजरात की जनता भाजपा को जिता ही है और कांग्रेस को हरा रही है और इन दोनों के मैच में AAP की पोजीशन एक दर्शक जैसी ही है. आप अगर इसबार के एग्जिट पोल्स में AAP के लिए अनुमान देखें तो आपको सिर्फ हंसी है आ सकती है. एक चैनल ने 9-21, एक चैनल 3-11 और एक चैनल 2-10 सीटें दे रहा है. यह सर्वे है या कोई तुक्का। कम और ज़्यादा में इतना फासला कि कोई न कोई फिगर तो फंस ही जाएगी, यही हाल वोट शेयर का है 10 से 20 प्रतिशत यानि नीचे से डबल. मत प्रतिशत न हो गया रबड़ हो गया, चाहे जितना खींच कर लम्बा कर दो. बहरहाल भागते भूत की लंगोटी ही भली. एग्जिट पोल्स के बाद केजरीवाल के बयानों से तो यही लगता है कि अब हकीकत को स्वीकार कर लो. बहुत हो गया फेंकना, चुनाव ख़त्म फेंकना ख़त्म। वैसे हाथ कंगन को आरसी क्या वाली कहावत 8 दिसंबर को पूरी ही हो जाएगी तब तक अनुमानों से काम चलाइये। अगले साल चार राज्यों में चुनाव हैं, दो भाजपा शासित और दो कांग्रेस शासित, अब देखना है कि केजरीवाल और उनकी पार्टी कांग्रेस वाले राज्यों को प्राथमिकता देगी या फिर भाजपा वाले राज्यों को. मेरा तो अनुमान यही है कि केजरीवाल कांग्रेस वाले राज्य या राज्यों की ओर मुंह मारेंगे.

