लखनऊ: उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले घटित लखीमपुर हिंसा, प्रदेश की भाजपा सरकार के लिए सिरदर्द बनती नजर आ रही है। इस हिंसा में अब तक कुल 9 लोग मारे जा चुके हैं, जिसके बाद से प्रदेश की सियासत गर्म हो चुकी है। प्रदेश ही नहीं देश की सभी राजनीतिक पार्टियाँ इस घटना की आँड़ में अपनी राजनीति चमकाना की कोशिश में लगी है। वहीं ‘किसान आंदोलन’ जो पिछले 10 महीने से दिल्ली बार्डर और पश्चिमी यूपी तक सीमित होकर रह गया था, इस हिंसक घटना के बाद अब उसके पूरे प्रदेश में फैलने की संभावना जतायी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, लखीमपुर हिंसा ने विपक्ष को बैठे-बैठाए यूपी में भाजपा के खिलाफ एक मुद्दा दे दिया है। हालांकि योगी सरकार ने बिना समय गवाएं मृतकों के परिवार को 45 लाख रुपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी, घायलों को 10 लाख रुपये एवं हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज द्वारा न्यायिक जांच कराने का वादा कर डैमेज कंट्रोल करने का पूरा प्रयास किया है। घटना के बाद क्षेत्र में शांति बहाली के लिए प्रसाशन ने किसान नेता राकेश टिकैत का सहयोग लिया है, ये बात सबसे महत्वपूर्ण और गौर करने वाली है।
Read also: यूपी चुनावी मोड में, सियासी बिसात बिछाने में लगे सभी दल
हालांकि, इस घटना से पहले इस क्षेत्र के किसान और सिख वोटर भाजपा को वोट करते आए है लेकिन अब उनमें रोष है। जिस तरह से विपक्षी पार्टियों ने इन घटना के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, उससे लगता है विपक्ष और आंदोलनकारी इसे प्रदेश की राजधानी के करीब पहुंचाने में सफल रहे है।
बतादे, कि सिख वोटरों का दबदबा क्षेत्र की चीनी मिलों, सोसाइटी से लेकर राजनीति में भी है जिसका नुकसान भाजपा को यूपी ही नहीं बल्कि उत्तराखंड में भी हो सकता है क्योंकि तराई इलाकों में पीलीभीत से लेकर काशीपुर, रुद्रपुर, गदरपुर, बाजपुर, सितारगंज जैसे इलाके में भी यह समुदाय और किसान काफी संख्या में है।
बताते चले कि लखीमपुर खीरी में भाजपा सभी 8 सीटों पर जीती थी। साथ ही इससे लगे 6 जिलों की 42 विधानसभा सीटों में से 37 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है। हालांकि मध्य यूपी, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में किसान असंगठित है जिसके चलते इसका व्यापक असर नहीं पड़ेगा लेकिन विपक्ष इस मुद्दे को आसानी से नहीं छोड़ेगी।
Read also: यूपी चुनाव में ममता की नजर समाजवादी पार्टी से गठबंधन पर
गौरतलब है कि 2017 में करीब 27 वर्ष बाद भाजपा ने पूर्वांचल की लगभग 28 जिलों की 164 सीटों में से 115 सीट जीतकर सत्ता में वापसी की थी। हालांकि सपा से लेकर कांग्रेस इसको इस क्षेत्र में बढ़ाने का प्रयास कर रही लेकिन असंगठित किसानों और कमजोर किसान के कारण इस क्षेत्र में इसका असर कम रहने की संभावना है। वहीं बुंदेलखंड के 7 जिलों बांदा, झांसी, जालौन, महोबा, हमीरपुर, चित्रकूट और ललितपुर की कुल 19 विधानसभा सीटों पर 2017 में भाजपा ने जीत हासिल थी। प्रदेश की सभी पार्टियाँ चाहे कांग्रेस हो या सपा या फिर रालोद सभी इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2022 में अपने राजनीतिक लाभ के लिए भुनाना चाहती है।इसीलिए कांग्रेस यूपी पर्यवेक्षक और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब और यूपी के चुनावों को देखते हुए सूबे में भेजा गया हैं।

