- नवेद शिकोह

बीते शुक्रवार को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव योगी सरकार पर काफी आक्रमक दिखे। वो पहली बार किसान अंदोलन की पिच पर खेलते दिखे। अलीगढ़ में उन्होंने किसान महापंचायत की और खूब दहाड़े। इस दौरान वो ऐसे शब्दों का भी प्रयोग करने लगे जो दूसरे को आग बबूला कर दे। ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दे जो सत्तारूढ़ दल के लिए नुकसानदेह और सबसे बड़े विपक्षी दल सपा के लिए फायदेमंद साबित हो। विपक्ष को ठंडा और कमजोर मानने वाले इस तरह के आरोप लगाते रहे कि सीबीआई कार्यवाही के डर से विपक्षी अपनी भूमिका निभाने में अक्षम साबित हुआ। ये बात सच भी है कि सबसे बड़ा विपक्षी दल सपा पिछले चार साल के योगी सरकार के कार्यकाल में ज्यादा मुखर और जमीनी संघर्ष करता कम दिखा। सपा नेता आजम खान को अपवाद मानकर क्षेत्रीय दलों के सबसे बड़े नेताओं के खिलाफ तमाम गंभीर आरोपों के बाद भी सीबीआई की फाइल़े नहीं खुलीं। यूपी के विधानसभा चुनाव के नजदीकी वक्त बड़े क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ अब यदि कोई कार्रवाई हुई तो सत्तारूढ़ दल को इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा।
इस बात को बखूबी जानकर ही अब योगी सरकार के अंतिम वर्ष अखिलेश यादव आक्रामक तेवरों में हैं। गोयाकि वो चार वर्ष की कसर नौ महीने में निकालने की योजना पर काम कर रहे हैं।
गौरतलब है कि यूपी में चुनावी वर्ष चल रहा है। जो विपक्षी दल जितना आक्रामक होगा उसे एंटीइनकमबेंसी का उतना ही लाभ मिल सकता है। इस समय कृषक कानूनों से किसानों की नाराजगी विपक्षी दलों का सबसे बड़ा मुद्दा है। खाप पंचायतों की सूरत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आकार ले रहे किसान आंदोलन की फसल अभी तक सभी छोटे-बड़े दला भुनाते रहे पर यूपी के सबसे बड़े विपक्षी दल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अभी तक किसानों की समस्याओं से जुड़ी ग्राउंड पर पैर भी नहीं रखा था। लेकिन अब वो देर आए पर दुरुस्त आए। अलीगढ़ में अपनी पहली किसान महापंचायत में अखिलेश बिल्कुल नए रूप में एंग्री यंग मैन की भूमिका मे दिखे।
कहते हैं कि डर के आगे जीत है, यानी जीत हासिल करने के लिए डर को पीछे छोड़ना पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि इतनी सी बात समझने के लिए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को चार वर्ष लग गए।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के चार वर्षों में विपक्षी सियासत में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सुर्खियों मे रही और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हाशिये पर। वजह ये थी कि जमीनी पार्टी कहे जाने वाली सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव जमीन पर कम ट्वीट पर ज्यादा नजर आए थे। वो इतना आक्रामक भी नहीं हुए जितना हमलावर उन्हें सूबे के सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के रूप में होना चाहिए था। यही वजह रही कि कहने वालों ने जो मुंह मे आया कह दिया। कोई कहता था कि विपक्ष मरा हुआ है तो कोई कहता था कि विपक्ष डरा हुआ है। कहने वाले लोग यही कहते रहे कि क्षेत्रीय दलों के बड़े नेता जानते हैं कि उनके मुंह के साथ एजेंसियों की फाइल भी खुल सकती है।
उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा विपक्षी दल समाजवादी पार्टी है। जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं सबसे कद्दावर और प्रभावशाली नेता अखिलेश यादव हैं। ये लोकप्रिय भी हैं और इनका जनाधार भी है। सपा का संगठन भी मजबूत है और यदि आक्रमाकता की गूंज ने सीबीआई या किसी दूसरी एजेंसी को नींद से जगा दिया तो कोई भी बड़ा नेता आजम खान बन सकता है। यानी जेल जा सकता है। ऐसे में चुनावी बेला मे कोई बड़ा क्षेत्रीय नेता जेल चला गया तो मोदी-योगी की लोकप्रियता की आंधी में बिखरा उसका वोटबैंक एक बार भी जाति के आधार पर पुनः अपनी जमीन से जुड़ जाएगा। इस तरह का कोई कदम सत्ता के लिए घातक और विपक्ष के लिए राहत बन सकता है। अखिलेश यादव इन सच्चाइयों के मद्देनजर पिछले चार वर्ष योगी सरकार के खिलाफ इतने मुखर नहीं हुए जितने आक्रामक वो चुनावी वर्ष में नजर आ रहे हैं।

