राजनीति में सारा खेल कुर्सी का होता है और वह भी मनचाही कुर्सी का। कभी कोई चाहता है कि किसी ख़ास के पास उसकी कुर्सी हो तो कभी किसी ख़ास से दूर वाली कुर्सी की चाहत रखता है, ताज़ा मामला प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और समाजवादी वपरती से जसवंत नगर के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा श्री शिवपाल यादव का है। विधानसभा के उन्हें जो कुर्सी अलॉट हुई है उन्हें वह पसंद नहीं अपने लिए वह अपनी पसंद की कुर्सी चाहते हैं। कुर्सी का मतलब वह उस जगह नहीं बैठना चाहते जहाँ उनके बैठने की जगह अखिलेश यादव ने तय की है क्योंकि सदन में पार्टी के नेता ही तय करता है उसके सदस्य उसके तय किये हुए क्षेत्र में कौन सी सीट पर बैठें।
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इस बारे में शिवपाल सिंह यादव ने विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना से सदन में उनके बैठने के लिए निर्धारित सीट को बदलने की दरख्वास्त की है। सीट बदलने की मांग की वजह वैसे तो नहीं बताई गयी हैं लेकिन सभी को मालूम है कि वह वजह क्या है, एक तो उन्हें जो सीट अलाट की गयी है वह उनकी वरिष्ठता के हिसाब से बिलकुल सही नहीं है, दूसरे वह समाजवादी पार्टी के विधायकों से अलग बैठना चाहते हैं, शिवपाल यादव अब समाजवादी नहीं दिखना चाहते भले ही वह सपा के टिकट से चुनाव जीते हों।
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बता दें कि सत्र के पहले दिन जब सभी सपा विधायक सदन में पार्टी की लाल टोपी पहनकर गए थे तब शिवपाल यादव के सिर पर वह लाल टोपी नहीं थी। बता दें कि चुनाव बाद अखिलेश और शिवपाल के बीच की दूरियां कम होने की जगह और बढ़ गयीं हैं। शिवपाल के कई बार भाजपा में जाने की अफवाहें भी उड़ीं जिसपर अखिलेश का बयान भी आया कि भाजपा से मिलने वालों की सपा में कोई जगह नहीं। जवाब में शिवपाल ने उन्हें पार्टी से निकालने की बात भी कही. दरअसल चुनाव बाद जब पार्टी ऑफिस में सपा विधायकों की बैठक हुई थी और उस बैठक में शिवपाल को नहीं बुलाया गया था, यह खटास तब से और बढ़ी है, हालाँकि इस पर सपा का कहना था कि वह अलग दल के हैं।

