नुक़सान से बचने के लिए चेहरे बदलने की कवायद

आर्टिकल/इंटरव्यूनुक़सान से बचने के लिए चेहरे बदलने की कवायद

Date:


नुक़सान से बचने के लिए चेहरे बदलने की कवायद

-फरीद वारसी

नुक़सान से बचने के लिए चेहरे बदलने की कवायद

भाजपा के अध्यक्ष रहे अमितशाह ने एक बार अपने साक्षात्कार मेें कहा था कि वे सत्ताविरोधी लहर जैसी किसी चीज को नहीं मानते हैं। वैसे यह उनका अति आत्मविश्वास ही कहा जाएगा। क्योंकि अब यही भाजपा अपने सबसे अहम चुनावी रणनीतिकार अमितशाह के उपरोक्त विचारों के विपरीत जाते हुए उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पूर्व सरकार व संगठन में बडे़ फेरबदल इसलिए ही करने जा रही है कि ताकि चुनावों में पार्टी को सत्ताविरोधी लहर का सामना न करना पड़े। विदित हो पिछले दिनों दिल्ली में संघ व भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की हुई एक बैठक में उत्तर प्रदेश की राजनीति के संबंध में मंथन हुआ और यह तय हुआ कि प्रदेश सरकार और संगठन में बदलाव किया जाए। बहरहाल, ऐसी चर्चा है कि कोराना की दूसरी लहर के कम होते ही योगी सरकार और संगठन में बदलाव किया जाएगा। फेरबदल का यह दांव कितना कारगर रहेगा, यह तो अगले साल मार्च आने वाले चुनाव परिणाम ही बताएंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर से निपटने में जिस तरह से योगी सरकार नाकाम रही, खास तौर से वक्त पर पीड़ित लोगों को समुचित इलाज न मिलने, लचर चिकित्सा तंत्र व मृतकों की संख्या के बढ़ने से न सिर्फ प्रभावित लोगों में, बल्कि आमवर्ग में योगी सरकार के खिलाफ नाराजगी साफतौर पर महसूस की जा रही है। वैसे तो प्रदेश में सबकुछ ठीक है। योगी के नेतृत्व में कोरोना से निपटने सरहानीय प्रयास किए जा रहे हैं। लोगों राहत की सांस ले रहे हैं। इस तरह की खबरें प्रचारित व प्रसारित कर सरकार की बिगड़ी छवि को ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है। अब यह बात अलग है कि लोगबाग इतने मासूम नहीं हैं कि भाजपा की गुमराह करने वाली डेमेज कंट्रोल की पर्दे के पीछे से की जा रही कोशिशों को समझ नहीं रहें हैं। खुद भाजपा भी यह महसूस कर रही है कि सरकार की इमेज सुधारने के प्रयास आम लोगों को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। उसका कारण यह है कि वास्तव में कोरोना से निपटने में योगी सरकार की असफलता के निशान इतने गहरे हैं कि समूचे प्रदेश में त्राहिमाम-त्राहिमाम मचा और जिसकी गूँज लंबे समय तक सुनी जाती रहेगी। माना जाता है कि हिन्दुत्व की कट्टर छवि वाले मुख्यमंत्री योगी के पास चूंकि प्रशासनिक अनुभव पर्याप्त नहीं है और वे प्रदेश की नौकरशाही पर बहुत अधिक निर्भर हैं और नौकरशाही की निरंकुश प्रवृति ने कोरोना से निपटने में जो कदम उठाए उसका खामियाजा प्रदेश ने भुगता और इस जिम्मेदारी से खुद मुख्यमंत्री भी नहीं बच सकते हैं। तभी तो भाजपा को आगामी चुनाव में अपने हालात साजगार दिख नहीं रहे हैं और बिगड़ी बात को बनाने के लिए जैसाकि उल्लेखनीय भाजपा राजनीति नुकसान से बचने के लिए सरकार व संगठन में फेरबदल करने जा रही है। शायद इस संबंध में उसका होमवर्क भी पूरा है।

जहां तक संभावित बदलाव का सवाल है कि सरकार व संगठन में कौन आएगा और किसे बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों उपमुख्यमंत्रियों डाॅ. दिनेश शर्मा व केशव प्रसाद मौर्या को बदला जा सकता है। केशव प्रसाद मौर्या को स्वतंत्र देव सिंह की जगह पर प्रदेश भाजपा का पुनः अध्यक्ष बनाया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार भाजपा आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष के पद से स्वतंत्र देव सिंह को हटाने का मन बना लिया है। उनकी विदाई पंचायत चुनावों में भाजपा को मिली असफलता से जोड़कर भी देखी जा रही है। उपमुख्यमंत्री डाॅ. दिनेश शर्मा संघ के बहुत करीबी हैं लेकिन उनको भी हटाए जाने की चर्चाएं है। कहा जा रहा है कि उनको हटा कर जो नुकसान होगा वह प्रधानमंत्री के बेहद करीबी गुजरात के पूर्व नौकरशाह और अब प्रदेश विधान परिषद के सदस्य अरविंद शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाकर पूरा किया जाएगा। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उन्हें गृहविभाग तक दिया जा सकता है। और तो और उनके जरिए प्रदेश की नौकरशाही को भी कंट्रोल किया जाएगा। संभावित फेरबदल का निष्कर्ष एक यह भी है कि अरविंद शर्मा को आगे रख कर यूपी को सीधे दिल्ली से नियंत्रण करने की एक तरह की तैयारी भी है। यहां यह बताते चलें कि प्रधानमंत्री की पहल पर उन्हें प्रदेश विधानपरिषद का सदस्य बनाया गया और वे सदस्य बनते ही सूबे में पर्दे के पीछे से सक्रिय हो गए और सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करने लगे और चर्चा तो यह भी है कि अरविंद शर्मा की इसी सक्रियता के कारण योगी और उनके बीच काफी कुछ अच्छा नहीं हैं। अब ऐसे संबंधों के चलते संभावित मंत्रिमंडल कितना सहज होगा यह देखने की बात होगी। इसके अलावा उन मंत्रियों को भी हटाए जाने की चर्चा है जो पंचायत चुनावों में पार्टी को उम्मीदों के मुताबिक परिणाम नहीं दिलाए पाए। कुछ के विभाग बदले जाएंगे और तीन मंत्रियों निधन होने से मंत्रिमंडल में जो स्थान रिक्त हुआ है उन्हें भरा जाएगा। लेकिन सवाल वही पुराना कि सरकार व संगठन का चेहरा व चाल बदल कर उलटी दिख रही राजनीतिक बाजी को पलटना क्या इतना आसान होगा, वह भी तब जबकि अगले विधानसभा चुनाव में अब बहुत ज्यादा वक्त नहीं रह गया है। और तो और कोरोना की दूसरी लहर अभी कायम है और तीसरी संभावित लहर लोगों में खौफ पैदा किए हुए है। भाजपा के लिए चिंताएं और भी हैं। ताजातरीन रेटिंग के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमितशाह की लोकप्रियता बहुत तेजी से नीचे गिरी है जिसने संघ की पेशानी पर बल पैदा कर दिए हैं। यानि भाजपा के लिए यूपी के चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी भी पहले की तरह रामबाण साबित नहीं हो सकती, सो यूपी में बदलाव की कवयाद का एक कारण यह भी है कि मोदी-शाह की लोकप्रियता में गिरावट का आना। ताकि चुनाव बाद परिणाम अगर अनुकुल न हो तो अपने-अपने सिर बचा कर दूसरों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का रास्ता खुला रहे।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related