उत्तर प्रदेश की योगी सरकार या संगठन कहाँ होगा बदलाव

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार या संगठन कहाँ होगा बदलाव

धीरज उपाध्याय

देश में एक तरफ जहां करोना संक्रमण से निपटने के लिए रणनीतियां बनायी जा रही है वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के प्रदर्शन और 2022 विधानसभा चुनावों को लेकर  रणनीतिक मंथन चल रहा है। इसीलिए दिल्ली से भाजपा के महासचिव संगठन बीएल संतोष लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं और प्रदेश के छोटे बड़े नेताओं से फीडबैक ले रहे हैं। लखनऊ में  राजनीतिक सुगबुगाहट और अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक सूबे में जल्द ही सरकार और संगठन में फेरबदल होना लगभग तय माना जा रहा हैं।   

बता दें कि यूपी में वर्तमान समय में करीब 6 मंत्री पद खाली हैं और चुनावी वर्ष होने के कारण योगी सरकार मंत्रिमंडल विस्तार द्वारा जातीय समीकरण साधने का प्रयास करेगी। मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा चर्चा उपमुख्यमंत्री के रूप मे इसी साल जनवरी में वीआरएस लेकर ब्यूरोक्रेसी से राजनीति में आए (Arvind Kumar Sharma) अरविंद कुमार शर्मा (एके शर्मा) के नाम की हैं। एके शर्मा जिन्हें प्रदेश में विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) बनाया गया है। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी अफसरों में से एक माना जाता हैं जो गुजरात से लेकर दिल्ली तक उनके साथ रहे हैं और अब यूपी में उनकी आँख और कान का काम कर रहे हैं।

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हालांकि मुख्यमंत्री योगी के समर्थन वाला धड़ा ये कभी नहीं चाहेगा है कि प्रदेश मे सत्ता के दो केंद्र (power centre) बने और भाजपा नेत्रत्व भी ये भलीभांति जानता है कि उनके पास सूबे में मुख्यमंत्री ‘योगी’ के बराबर का कोई चेहरा नहीं हैं। लेकिन अगर केंद्रीय नेत्रत्व ने निरंकुश लालफ़ीताशाही (bureaucracy) पर नियंत्रण और अपनी अधूरी परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एके शर्मा (A.K. Sharma) का नाम तय किया है तो इसे टालना भी योगी या किसी अन्य के लिए संभव नहीं होगा। बताते चले कि प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले करोना के “वाराणसी माडल” Varanasi model की तारीफ करके इस बात के संकेत साफ कर दिये थे कि अब उन्हे यूपी में कुछ बड़ी ज़िम्मेदारी मिल सकती हैं।

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वहीं करोना की दूसरी लहर और पंचायत चुनाव में रणनीतिक विफलता से संगठन और  कार्यकर्ताओ में असंतोष हैं। इसके चलते संगठन में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह की विदाई लगभग तय मानी जा रही है। वहीं नए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक बार फिर केशव प्रसाद मौर्य की वापसी होना भी तय हैं, जिनके नेत्रत्व में भाजपा ने पिछड़ों और अति पिछड़ों को साधकर 2017 में 300 + सीटे जीतकर 15 वर्ष के वनवास को खत्म कर प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनायी थी। भाजपा की नजर करीब 52 फीसदी पिछड़े और अति पिछड़े वोटरों पर हैं जो पूर्वांचल के साथ सोनभद्र और बुंदेलखंड से सटी करीब 100 सीटों पर अपना असर रखते हैं जहां केशव प्रसाद एक फिर उनके लिए कमल खिला सकते हैं।

क्या भाजपा कोरोना, पंचायत चुनाव और किसान आन्दोलन से हैं चिंतित 

बता दे की कि योगी सरकार की छवि को करोना की दूसरी लहर और पंचायत चुनाव में काफी नुकसान (डेंट) हुआ हैं और बीजेपी केंद्रीय नेत्रत्व इससे खासा चिंतित है क्योंकि केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर ही जाता हैं और 2022 से महज दो साल बाद ही लोकसभा के चुनाव होंगे। अतः 2022 यूपी चुनाव के प्रदर्शन पर मोदी का तीसरा कार्यकाल निर्भर करेगा। इससे पहले बीजेपी ने यूपी में सभी राजनीतिक समीकरणों को पीछे छोड़ते हुए 2014 के लोकसभा चुनावों में 71 और 2019 में 62 सीटे जीतकर दिल्ली का रास्ता तय किया था।

भाजपा में यह पहली बार हो रहा है कि जब एक केंद्रीय टीम आकर प्रदेश में सीधे अलग-अलग स्तर के नेताओं से फीडबैक ले रही है। इस रायशुमारी का मकसद करोनाकाल में प्रदेश सरकार की गिरती लोकप्रियता से होने वाले राजनीतिक नुकसान को कम करना बताया जा रहा है।

हालांकि भाजपा के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि प्रदेश में सक्रिय विपक्ष का स्थान बिल्कुल खाली है। जहां विपक्ष केवल नाममात्र बचा है और वो केवल एसी कमरों में बैठकर बयानों और ट्वीट के सहारे राजनीति कर रहा है। विपक्ष चाहे वो सपा, बसपा या फिर कांग्रेस सभी ने अपनी सारी आस किसान-आंदोलन और भाजपा के खिलाफ उत्पन्न होने वाले असंतोष पर लगा दी है और बजाय सड़क पर उतरकर संघर्ष करने के।

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