अमित बिश्नोई
आज ज़माना रो रहा है, सुरों की मल्लिका अपने सुरों को दुनिया में छोड़कर इस नश्वर संसार से विदा ले चुकी हैं, मिश्री सी मिठास अपने गीतों में घोलने वाली आवाज़ अब हमारे बीच नहीं रहीं, सुर साम्राज्ञी भारत रत्न हेमा मंगेशकर जिन्हें सारा ज़माना लता मंगेशकर के नाम से जानता है देह त्यागकर परमात्मा के चरणों में जा चुकी हैं. किसी ने कहा है कि मौत उसकी है, करे जिसका ज़माना अफ़सोस, यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए. लता दीदी के लिए यह पंक्तियाँ बिलकुल फिट बैठती हैं क्योंकि उनके निधन पर देश ही नहीं दुनिया रो रही है।
अपने इस नेशनल हीरो के निधन पर शोक में तिरंगे को झुका दिया गया, इस तरह का सम्मान हर किसी को नहीं मिलता। आज देश के हर शख्स को चाहे उसे संगीत से लगाव हो या न हो, आँखों में पानी है और कानों में कहीं गूँज रहा “ऐ मेरे वतन के लोगों” का नगमा. शहंशाहे जज़्बात दिलीप कुमार ने कहा था कि लता की आवाज़ खुदा का एक करिश्मा है. सच में करिश्मा ही तो है. वह आवाज़ जो कभी बेसुरी नहीं हुई।
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संगीत के इस शाहकार का जन्म 1929 में इंदौर में हुआ था, 92 साल की आयु मिली और 77 वर्षों तक सुरों की सरिता बहाई। कैरियर का इतना लम्बा सफर जिसमें हज़ारों गाने अपने आप में भारत रत्न से सुशोभित लता मंगेशकर की मेहनत और महानता को दर्शाता है. कौन सा ऐसा पुरस्कार है जिसने लता दीदी से खुद को जोड़कर खुद को सम्मानित न महसूस किया हो. पद्म विभूषण, पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरूस्कार और न जाने कितने अनगिनत प्रतिष्ठित अवार्ड और सम्मानों उन्हें नवाज़ा गया है।
लता मंगेशकर ने कितने गाने गाये और कौन कौन से गाये इसका ज़िक्र करना बेकार है क्योंकि यह बिलकुल ऐसी बात होगी कि कोई कहे देखो सूरज से इतनी रौशनी निकलती है. जिस तरह सूरज की रौशनी की अनंत सीमा है उसी तरह लता मंगेशकर की गायकी भी अनंत है, एक से एक सुरीले नग्में जो कानों में हमेशा मिठास घोलते रहे हैं और रहती दुनिया तक घोलते रहेंगे।
लता दीदी (Lata Mangeshkar News) की प्ले बैक सिंगिंग पर कोई कितना लिख सकता है, बहुत समय चाहिए, बहुत से पन्ने चाहिए और बहुत सी रौशनाई चाहिए। पोथियाँ भरती जाएँगी फिर भी सिलसिला ख़त्म नहीं होगा, इसलिए हम प्ले बैक सिंगिंग से हटकर लता दीदी के बारे में कुछ और जानकारी आपसे शेयर करना चाहते हैं. लता दीदी एक प्ले बैक सिंगर के अलावा एक संगीत निर्देशक, फिल्म मेकर और एक्टर भी रही हैं. जी हाँ हेमा मंगेशकर को लता का नाम उनकी अदाकारी को देखकर उनके पिताश्री दीनानाथ मंगेशकर ने दिया था. हेमा ने एक नाटक “भाव भंगिमा” में लतिका नाम का किरदार निभाया था जिससे दीनानाथ जी इतना प्रभावित हुए कि वह उन्हें लता के नाम से पुकारने लगे और तबसे उनका नाम हेमा से लता मंगेशकर पड़ गया।
फनकारों के परिवार में जन्मी लता पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं, चार बहनें और एक भाई, सभी संगीतज्ञ, सभी सुरीले। मीना, आशा, ऊषा और हृदयनाथ। कुल मिलकर कहें तो एक सुरीला संसार। अपने भाई बहनों से लता दीदी कितना प्यार करती थी यह इस घटना से आपको पता लग जायेगा जिसे मैं आपको बताने जा रहा हूँ. लता जब पांच वर्ष की थीं उन्होंने एक एक्टर के रूप में अपने पिता की नाटक कंपनी जो मराठी में प्ले करती थी काम शुरू किया। तभी उनका स्कूल में दाखिला कराया गया और पहले ही दिन उन्होंने स्कूल इसलिए छोड़ दिया कि स्कूल ने उन्हें आशा (भोंसले) को अपने साथ लाने की इजाज़त नहीं दी।
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प्रेम और मोहब्बत की मिसाल रही लता मंगेशकर के पूरे फ़िल्मी कैरियर में सिर्फ एक ही बार विवाद हुआ. गाने की रॉयल्टी को लेकर उनके और मोहम्मद रफ़ी के बीच मतभेद हुआ और दोनों ने एक दूसरे के साथ काफी समय तक गाने नहीं गाये लेकिन दोनों ने एक दूसरे का हमेशा सम्म्मान किया। आज यह दोनों हस्तियां दुनिया में नहीं मगर दिलों में बसी हुई हैं. मेलोडी ऑफ़ क़्वीन, Nightingale of India का यह दुनियावी सफर आज थम गया और एक ऐसा शून्य छोड़ गया जिसको भर पाना असंभव है क्यों क़ुदरत के करिश्मे बार बार नहीं होते। एक शेर के साथ मैं लेख को विराम दूंगा “हैं और भी दुनिया में सुखन्वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और”. सही कहते हैं लता मंगेशकर का अंदाज-ए-गायकी सबसे जुदा है।

