सपनों का चुनाव

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सपनों का चुनाव

अनूप मणि त्रिपाठी

नेता जी चले आ रहे हैं। इस बात का यकीन करने के लिए भोला ने अपने को चिकोटी काटी। बात सोलह आने सच निकली। नेता जी उसे सामने से आते दिख रहे हैं। आते-आते वे पास आ गए हैं। उनकी गंध भोला के नथुने महसूसने लगे, इतने पास। दूर से जो बिंदू दिख रहा था अब उसके सामने वृत्त जैसा था। अब भोला का संदेह पूरी तरह से मिट चुका था। नेता जी उसके समक्ष खडे़ थे। वे आते ही मुस्कुराए नहीं, क्योंकि वे मुस्कुराते हुए आ रहे हैं। नेता जी के आते ही भोला तेजी से अपनी खाट आगे खिसकाने लगा। किसी फिल्म की कहानी की तरह ही यहां भी भोला की खाट टूटी हुई है। उसने वह खाट धूप में रख छोड़ी है। वो क्या है कि धूप से खून पीने वाला खटमट भाग जाता है। कहां वह खटमल से निजात पाने के बारे में सोच रहा था कि कहां अब नेता जी गले पड़ने वाले थे।

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अब दृश्य यह है कि नेता जी भोला के बिल्कुल करीब हैं। इतने करीब की उनकी आँखों में झांक कर उनकी आत्मा तक पहुँचा जा सकता था।(आत्मा!) नेता जी उसके कंधे पर हाथ रखते हुए किसी रिकार्ड की तरह बजेे,‘ भोला ! झोपड़ी की जगह पक्का मकान, टूटही चरपाई की जगह गुलगुला सोफा, चप्पल की जगह बूट, ढिबरी की जगह बल्ब, चिथडे़ की जगह सूट, खड्डजें की जगह चौड़ी सड़क, कीचड़ की जगह पक्की नाली और भैंस की जगह खड़ी होगी तुम्हारी कार। बस भोला झटपट बनवाओ हमारी सरकार…’ नेता जी जब ये सब बोल रहे थे, तब न तो भोला, न तो उसके पांव धरती पर थे। वे तो स्वर्ग लोक में विचरण कर थे। नेता जी के श्रीमुख से निकले शुरू के ही कुछ शब्दों ने भोला पर अपना असर दिखा दिया था। नेता जी अभी बोले जा रहे हैं और भोला स्वर्ग में विचरण कर रहा है। मंझे हुए(घाघ नहीं) नेता ने जरा ही देर में स्थिती को भांप लिया। उन्होंने भोला का कंधा पकड़ कर उसे कसकर झकझोरा।

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भोला को लगा जैसे किसी ने उसका झोंटा पकड़कर उसे जमीन पर जोर से पटक दिया हो! नेता जी की इस ‘हरकत’ पर उसे गुस्सा आया। सारा मजा जो किरकिरा हो गया था! सपने का ठीक से मजा भी नहीं लेने दिया! भोला अपनी खीज को छिपाते हुए बोला, ‘क्या बोल रहे हैं आप? अपने कहे पर तनिक ध्यान भी धरे नेता जी! लेकिन आप ने जो भी कहा बहुत सोहाया…कसम से!’ भोला की इस प्रतिक्रिया से नेता जी पहले सकुचाए गए, क्योंकि वे भोला को मुद्दतों से जानते थे कि भोला बिल्कुल भोला है। उन्हें भोला से इस पलटवार की कतई उम्मीद नहीं थी। जो अपनी असल भावना को छुपा न पाए, वह असली नेता नहीं। चूंकि नेता जी असली वाले… पक्का मार्का नेता थे इसलिए वे अपनी असली भावना को बहुत आसानी से छुपा गए। वे मधुर मुस्कान फेंकते हुए बोले, ‘ अरे,हम क्या बोल रहे हैं जो विपक्षी बोल रहे हैं। जिस गांव में सूखा पड़ा है, वे वहां स्वीमिंग पूल खोल रहे हैं।’ अब भोला आगे क्या बोलता! शिष्टाचारवश उसने वही सब कहा, जो इन दिनों एक सभ्य आम वोटर कहता है।

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नेता जी जा चुके हैं। नेता जी के जाते ही भोला की लुगाई ने भोला की तरफ देखा और बोली, ‘जैसे उदई वैसे भान,उनके पोंछ न उनके कान।’ मगर भोला ने अपनी लुगाई के कहे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह चुपचाप खाट के पास पहुंचा। भोला की लुगाई जोर-जोर से बड़बड़ा रही है, पर भोला पर इसका कुछ असर होता नहीं दिख रहा है। वह तो निर्विकार रूप से खटमल मारने के लिए खाट पीट रहा है। ताकि रात को वह सुकून से सो सके और वह सपना जो कुछ देर पहले नेता जी ने तोड़ दिया था, उसे वह इत्मीनान से पूरा देख सके।

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