गाँधी परिवार नहीं तो फिर कौन?

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अगस्त का महीना जाने वाला है और सितम्बर आने वाला है, अगले कुछ दिन 137 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के लिए काफी अहम् होने वाले हैं. वजह है देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव। सोनिया गाँधी अभी इसकी कार्यकारी अध्यक्ष हैं, वैसे लोग तो कहते हैं कि पार्टी राहुल गाँधी चलाते हैं और शायद काफी हद तक यह बात सही भी है. क्योंकि पार्टी से जुड़ा कोई भी फैसला हो पार्टी के लोग सोनिया के बजाय राहुल की तरफ ही देखते हैं. पार्टी में G-23 बनने की वजह भी शायद यही है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं से भरा यह ग्रुप नहीं चाहता कि पार्टी के फैसले अध्यक्ष की जगह कोई और करे. इसे राहुल गाँधी से कोई परहेज़ नहीं, परहेज़ है तो कार्यशैली से है. 2019 में लोकसभा का चुनाव हारने के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने वाले राहुल गाँधी पार्टी के अघोषित अध्यक्ष क्यों बने हुए हैं, ऐतराज़ इसी बात का है, पार्टी के फैसले लेना है तो सामने आइये, इंकार और इकरार के भंवर में फंसी पार्टी लगातार डूबती जा रही है. 

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कांग्रेस को नए अध्यक्ष की तलाश है, पूर्व निर्धारित और घोषित प्रोग्राम के हिसाब से अध्यक्ष पद के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए, पद के दावेदारों के नामांकन भी शुरू हो जाने चाहिए मगर यहाँ तो अब भी सन्नाटा है. लोग एकदूसरे का मुंह देख रहे हैं. राहुल गाँधी का पिछले कई सालों से इंकार अब भी जारी है, सोनिया गाँधी की सेहत उन्हें आगे और ज़िम्मेदारी लेने की इजाज़त नहीं देती, राहुल को बहन प्रियंका वाड्रा का इस पद के लिए नाम बढ़ाने पर भी आपत्ति है. अब तो वो इस बात पर अड़े हैं कि गाँधी फैमिली से कोई भी अध्यक्ष नहीं होगा, गाँधी फैमिली के बाहर से ढूंढिए। G-23 को छोड़कर कोई भी गाँधी फैमिली के बिना आगे की सोच ही नहीं रहा है. आज भी जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है राहुल को मनाने की कोशिशें चल रही हैं, हालाँकि राहुल के अड़ियल रवैये को देखते हुए इस बार यह लोग थोड़ा निराश भी हैं और शायद इसीलिए विकल्प के रूप में प्रियंका गाँधी का नाम भी लिया जा रहा है और कोशिश की जा रही है कि राहुल गाँधी अपनी बहन को इस बात की इजाज़त दे दें. वहीँ ज़िम्मेदारी से भागने वाले आनंद शर्मा कह रहे हैं कि क्या कांग्रेस में गाँधी फैमिली के अलावा कोई और नहीं है. अब यह कोई और कौन है यही सब लोग जानना चाहते हैं.

शर्मा हों या आज़ाद, दोनों को सोनिया ने बड़ी ज़िम्मेदारी दी मगर दोनों ही भाग खड़े हुए, आत्मसम्मान का बहाना बनाया, मगर यह सभी जानते हैं कि इन लोगों में चुनाव जिताने या जीतने का दम नहीं है, मोदी से लड़ने की बात तो बहुत दूर है. तो फिर सवाल यही है कि अगर सोनिया नहीं, राहुल नहीं, प्रियंका नहीं तो फिर किस्में है इस डूबती पार्टी को उबारने का दम. क्या राजस्थान के मुख्यमंत्री आशिक गेहलोत, क्या मुकुल वासनिक, क्या हरियाणा की कुमारी सैलजा, क्या राहुल के करीबी के सी वेणुगोपाल, क्या मल्लिकार्जुन खड़गे, क्या पंजाब की अम्बिका सोनी या फिर कोई और? इनके अलावा कांग्रेस के कुछ बड़े नाम वाले नेता तो G-23 में मौजूद हैं मगर इनमें से ज़्यादातर वह लोग हैं जो राज्यसभा की मलाई खाना ज़्यादा पसंद करते हैं, लोकसभा का चुनाव लड़ना नहीं। इनका काम दूसरों पर ऊँगली से उठाने से चल रहा है तो यह लोग ज़िम्मेदारी लेकर अपने ऊपर ऊँगली क्यों उठवाना चाहेंगे।

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कांग्रेस के गैर गाँधी फैमिली के अंतिम अध्यक्ष की बात करें तो सीताराम केसरी का नाम आता है, इस तरह पिछले 23-24 सालों से गाँधी परिवार ही यह ज़िम्मेदारी उठाता आ रहा है, समय ने करवट बदली तो देश में सत्ता बदली। सत्ता भी ऐसी बदली कि कांग्रेस मुक्त भारत की बातें होने लगीं। भक्तिकाल शुरू गया. जनता को पहले जिन जनसमस्याओं पर परेशानी होती थी उन जनसमस्याओं में अब उसे उज्जवल भविष्य दिखाई दिखाई देने लगा. उसे अब बेरोज़गारी, मंहगाई से कोई सरोकार नहीं रहा. वह अब अपने पैसे के लिए बैंकों की लाइन में भी खड़ा हो गया, एक आदेश पर बालकनी में थाली ताली भी बजाने लगा, उसे देश के नए नेतृत्व की हर बात में देश प्रेम, राष्ट्रवाद नज़र आने लगा. नतीजा यह हुआ कि देश की आज़ादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाली पार्टी से लोगों का मोह भंग होने लगा. लोगों का छोड़िये, पार्टी वाले ही हाथ का साथ छोड़ने लगे. नेतृत्व बदलने की बाते तो लोग करने लगे मगर नेतृत्व करने कोई आगे नहीं आया. आज एकबार फिर कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष को लेकर मंथन चल रहा है. गाँधी फैमिली अपनी बात पर अड़ी हुई है, तो अब देखना है कि  भाजपा और मोदी से टकराने कौन गैर गाँधी आगे आएगा?

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