कश्मीर 1990 में और कश्मीर में आज. क्या अंतर है तब के और अबके हालात में. तब भी कश्मीरी पंडित आतंकवाद का शिकार बने थे और आज भी आतंकवाद के साथ ही भाजपा सरकार की हठधर्मी का शिकार हो रहे हैं. तब भी टारगेट किलिंग के साथ दूसरे लोग भी मारे जा रहे थे और आज भी वही सब हो रहा है. मगर एक फर्क है और वो यह कि तब कोई कश्मीर फाइल्स नहीं बनी थी. तब किसी फिल्म मेकर ने नहीं बताया था कि कश्मीरी पंडितों को खून से सने चावल खाने पर मजबूर किया गया था. इस विषय पर आगे चर्चा करूंगा। फिलहाल सवाल यह है कि कश्मीर में 1990 की वापसी क्यों हो रही है और कौन है इसका ज़िम्मेदार। बेशक इन सब के पीछे पड़ोसी पाकिस्तान के नापाक इरादे हैं. इस बात से किसी को इंकार भी नहीं है लेकिन पिछले 30 बरसों से कश्मीर के आमलोगों की जिसमें कश्मीर में बसने वाले अल्पसंख्यक भी शामिल थे ठीकठाक जीवन व्यतीत कर रहे थे. पोलिटिकल व्यवस्था बहाल थी तो फिर ऐसा क्या हो गया गाड़ी ने यू टर्न मार लिया, या रिवर्स गेयर ले लिया।
कश्मीर में आखरी सरकार भाजपा और पीडीपी की थी. केंद्र में बदलाव हुआ और कहा गया कश्मीरी पंडितों की हितैषी सरकार आ गयी है अब सबकुछ ठीक हो जायेगा, आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, जन्नत के माहौल की फिर बहाली होगी, 1990 में पलायित हुए लाखों कश्मीरी पंडितों की अपने घरों में वापसी होगी। कश्मीर के राज्य का दर्जा ख़त्म कर दिया गया, तीन टुकड़ों में विभाजन हो गया, लद्दाख अलग, जम्मू अलग और कश्मीर अलग. यूनियन टेरिटरी बना दी गयी, राजयपाल नहीं उपराज्यपाल की नियुक्ति हो गयी, अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया गया. प्रचार किया गया कि कश्मीर को अब असली आज़ादी मिली है, पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्ज़े के दावे किये होने लगे. लेकिन कहीं न कहीं इस दौरान सुलगती हुई आग ने धुंआ छोड़ना शुरू कर दिया। पुलवामा हो गया, जवाब में सर्जिकल स्ट्राइक भी हो गयी. पर इन सबके बीच कश्मीर सुलग रहा था, उस आग बुझाने की कोशिश की जा रही थी या बताने की कोशिश की जा रही थी कि ऑल इज़ वेल लेकिन वेल कुछ भी नहीं था.
Read also: भागवत का बयान
यह आग भड़कती रही और सरकार उसपर पानी डालने की कोशिश करती रही ताकि धुंआ बाहर न आये और लोगों को न दिखे। आतंकियों से झड़पों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा, आतंकी भी मौत के घाट उतरते रहे और जवान भी शहीद होते रहे. गौर कीजियेगा तो 90 वाले कश्मीर की झलक दिखाई देने लगेगी। समय बीतता रहा और परिसीमन के नाम पर कश्मीर और जम्मू को बराबर करने की कोशिश शुरू हो गयी. जैसे जैसे परिसीमन का काम आगे बढ़ा, कश्मीर की डेमोग्राफी को बदलने की कोशिश आगे बढ़ी कश्मीरियों के पाकिस्तान द्वारा वरगलाए गए नौजवानो का गुस्सा भी भड़कता गया और ऐसे में आ गयी लगातार आठ फ्लॉप फ़िल्में देने वाली विवेक अग्निहोत्री की फिल्म “द कश्मीर फाइल्स” जिसमें एक से बढ़कर एक राष्ट्रवादी कलाकारों की भरमार थी, आप इनके ट्वीटर हैंडल पर जाकर इनकी राष्ट्रवादिता की जांच कर सकते हैं.
तो जनाब “द कश्मीर फाइल्स” में सच्चाई दिखाने के नाम पर जो कुछ दिखाया गया उसने कश्मीर मुद्दे में आग में घी डालने का काम किया। पीएम मोदी समेत भाजपा सरकारों और नेताओं द्वारा इस फिल्म के प्रोमोशन में जुटना कहीं न कहीं उन घावों को हरा कर दिया जो पिछले 32 सालों में धीरे धीरे भरने लगे थे. भले ही उन घावों में दर्द अब भी था लेकिन विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने उसे नियति मानकर सब्र कर लिया था, 2014 में केंद्र की सत्ता बदलने के बाद उन्होंने जो सपने संजोये थे वह सब धुल धूसरित हो चुके थे लेकिन “द कश्मीर फाइल्स” ने उन ज़ख्मों का दर्द और बढ़ा दिया, उन्हें कुरेद कुरेदकर। क्रिया की प्रतिक्रिया भी होती है और वह कश्मीर में शुरू हो गयी. आप तो चार सौ करोड़ रूपये कमाकर बैंकाक के होटलों में मस्ती करने पहुंच गए, एक राजनीतिक पार्टी ने उस फिल्म का भरपूर चुनावी फायदा उठाया लेकिन फिर शिकार वही कश्मीरी पंडित हो रहे हैं जिनके नाम पर तुमने करोड़ों रूपये कमाए और उन्होंने करोड़ों वोट।
आज कश्मीर में कश्मीर का कश्मीरी पंडित हो या एक आम हिन्दू, बिलकुल सुरक्षित नहीं है, उसे यह पता नहीं कि कब किधर से कोई आतंकी आएगा और उन्हें गोली मारकर चला जायेगा। वो कहीं भी सुरक्षित नहीं। न घर पर, न सड़कों पर और न ही ऑफिस में. उसके पास पलायन के सिवा रास्ता ही क्या है? लेकिन यहाँ भी उनके साथ सितम यह कि सरकार उन्हें कश्मीर से बाहर नहीं जाने दे रही है, उन्हें कैम्पों में कैद कर रही है, विरोध भी नहीं करने दे रही है क्योंकि उसे कश्मीरी पंडितों से ज़्यादा खुद की छवि की फ़िक्र है. कश्मीरी पंडितों का अगर फिर पलायन हो गया तो क्या कहेगी दुनिया, क्या कहेगा उनका वह वोट बैंक जो समझता है कि कश्मीर अगस्त 2019 में आज़ाद हुआ. वह अब वहां पर ज़मीन खरीद सकता है, मकान बनवा सकता है, कश्मीर जाकर रह सकता है लेकिन वहां के हालात क्या है यह तो वहां के कश्मीरी पंडित ही बता रहे है जो वहां के बाशिंदे हैं, जिनके पूर्वजों के पूर्वज वहां रहते आये हैं. कश्मीर में अपने परिजनों को रोज़ाना खो रहे इन कश्मीरियों का दर्द कश्मीर के बाहर वाले का क्या जाने। किसी कश्मीरी ने कहा था कि बिना सुरक्षा के दिल्ली में बैठे लोग कश्मीर में एक शाम गुज़ार कर दिखाएं तो जाने।
Read also: कांग्रेस को भारी पड़ सकता है इमरान प्रतापगढ़ी का प्रमोशन!
दिल्ली में हाई लेवल मीटिंगों का दौर जारी है, आतंकवादियों के एनकाउंटर भी जारी हैं, मीडिया उन्हें ज़ोरशोर से दिखाता भी है. भले ही उसकी हेड लाइन होती हो ” शोपिया में पांच आतंकी ढेर, दो जवान शहीद”. जवानों की शहादत को जगह बाद में मिलती है. अब एक सवाल से अपनी बात ख़त्म करता हूँ कि विवेक अग्निहोत्री को “द कश्मीर फाइल्स” बनाने में काफी समय लगा, बड़ा रिसर्च वर्क करना पड़ा, शायद 500 से ज़्यादा लोगों से बातचीत करनी पड़ी. ज़ाहिर सी बात है 32 साल पुरानी बातों की सच्चाई तलाशने में समय तो लगता ही है मगर अब उन्हें एक लिखी लिखाई पटकथा मिल रही है, बहुत रिसर्च की ज़रुरत भी नहीं, इतिहास को भी नहीं खंगालना पड़ेगा सबकुछ वर्तमान में चल रहा है तो फिर क्यों न वो “द कश्मीर फाइल्स” का सीक्वल बनायें ताकि लोगों को आज की भी सच्चाई का पता चल सके. वैसे फ़िल्मी दुनिया में तो सीक्वल का ज़माना भी है और सबसे बड़ी बात फिल्म के प्रमोशन के लिए वह लोग भी जो 24 *7 राजनीति करते हैं. तो क्यों न 400 करोड़ कमाने का एक और मौका छोड़ा जाय विवेक अग्निहोत्री जी! तो फिर हो जाय एक और “द कश्मीर फाइल्स-2”

