- अधिकारियों को किया सस्पेंड, मगर पार्टी से ही उठ रहे सवाल
- विपक्ष और जनआंदोलन का सामना करना सरकार के लिये होगा मुश्किल
सुनील शर्मा
न्यूज डेस्क। योगी सरकार के राज में हाथरस में युवती के साथ गैंगरेप प्रकरण में भले ही यूपी के अधिकारियों ने गैंगरेप को सिरे से नाकार दिया हो। भले ही सीएम योगी ने हाथरस के एसपी सहित पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर लोगों का गुस्सा शांत करने का प्रयास किया हो। मगर जनता के आक्रोश, विपक्षी पार्टियो और हाईकोर्ट सहित खुद की पार्टी के नेताओं के सवालों के बीच घिरी उत्तर प्रदेश सरकार को अब भी कई मुश्किल सवालों का जवाब देना होगा।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने हाथरस में मृत युवती के मामले में लापरवाही बरते जाने पर कड़ी कार्रवाई करते हुए हाथरस के एसपी विक्रांत वीर, डीएसपी राम शब्द, प्रभारी निरीक्षक दिनेश कुमार वर्मा, वरिष्ठ उप निरीक्षक जगवीर सिंह और हेड मुहर्रिर महेश पाल को निलंबित करने का आदेश दिया है। सीएम योगी ने खुद इस मामले में कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। मगर खुद उनकी पार्टी यानी भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती के ट्वीट ने निःसंदेह योगी सरकार को परेशानी में डाल दिया है। उमा भारती ने ट्वीट में कहा है कि हमने अभी राम मंदिर का शिलान्यास किया है और देश में रामराज लाने का दावा किया है। किंतू इस घटना से आपकी यूपी सरकार की और बीजेपी फॉर इंडिया की छवि पर आंच आई है।
जाहिर है कि उमा भारती मान रही हैं कि हाथरस मामले में पुलिस और यूपी सरकार की कार्यप्रणाली सही नहीं रही है। सीएम योगी की परेशानियों को और बढ़ाते हुए उमा भारती ने अगले ट्वीट कहा है कि मीडियाकर्मियों और राजनीतिक दलों को पीड़ित परिवार से मिलने दीजिये।
वहीं योगी सरकार द्वारा पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को निलंबित करने के बाद प्रियंका गांधी ने तुरंत ट्वीट कर कहा है कि कुछ मोहरों को सस्पेंड करने से क्या होगा। मुख्यमंत्री अपनी जिम्मेदारी से हटने की कोशिश न करें। प्रियंका ने सीएम योगी से इस्तीफे की मांग को भी ट्वीट में दोहराया है।
हाथरस मामले में हाईकोर्ट का दखल भी सरकार की मुश्किलों को बढ़ाऐगा। इस मामले में इलाहबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए यूपी सरकार और हाथरस के अधिकारियों को नोटिस जारी कर रात में पीड़िता के शव का अंतिम संस्कार किये जाने पर सवाल उठाये हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि मृतक का अंतिम संस्कार उसके धर्म और रीति-रिवाज के अनुसार होना चाहिये और परिवार को इसका हक है। सरकार को 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में इस बड़े सवाल का जवाब देने में मुश्किल होना तय है। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को भी नियत तिथि पर बुलाया है।
अपनी ही पार्टी की नेता, विपक्षी पार्टियों की चौतरफा घेराबंदी और जनता के आक्रोश और इलाहबाद हाईकोर्ट के सवालों के बीच घिरी यूपी की योगी सरकार के लिये निःसंदेह मुश्किल समय है। दलित युवती की मौत के बाद जनता का समर्थन भी मृतका के साथ है और योगी सरकार में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा दलित समाज भी इस मुद्दे पर एकजुट होकर जनआंदोलन करने पर उतर आया है। ऐसे में योगी सरकार के लिये आने वाले दिन मुश्किलों भरे साबित होने वाले है।

