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ये कैसी आज़ादी और कैसा आज़ादी का जश्न?

देश आजकल आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने पर जश्न मनाने में व्यस्त है, हर घर तिरंगा लहराने में सरकार भी जुटी हुई है और संघ भी जुटा हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश के लोगों से आज़ादी के इस अमृत महोत्सव में बढ़चढ़ हिस्सा लेने की अपील भी गई है. 13 से 15 अगस्त तक देश के हर घर के मस्तक पर तिरंगा फहराता दिखे ऐसा अनुरोध किया गया है. वर्चुअल दुनिया में सोशल प्लेटफॉर्म के महत्त्व को देखते हुए हर घर झंडा के साथ सभी लोगों से अपनी DP को भी बदलकर तिरंगा लगाने की बात कही गयी है. प्रधानमंत्री की इस अपील को भी देश के लोग पहले की अपीलों (थाली पीटना, टॉर्च जलाना ) की तरह सिर आँखों पर ले रहे हैं और उनके आदेश और निर्देश को मूर्त रूप देने में जुटे हुए हैं, पार्टी और सरकारी अमले का जुटना तो लाज़मी ही है. यहाँ तक कि तिरंगे से हमेशा दूरी बनाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रमुख ने भी अपनी DP पर तिरंगा लगा दिया है. लेकिन जश्न के इस अद्भुत माहौल के बीच आज हमें एक ऐसी तस्वीर नज़र आयी जिसने मन को विचलित कर दिया, सवालों का बवंडर दिमाग़ में उठने लगा, सोचने लगा कि आज़ादी का यह कैसा अमृत महोत्सव है? तस्वीर में जो दिख रहा है उसके बाद जश्न की बातें बेमानी सी लगने लगीं। 75 साल हो गए देश को आज़ाद हुए लेकिन आज भी इस तरह की तस्वीर सामने आ रही है जो सारे सरकारी दावों की पोल खोल रही हैं. यहां पर बेमौसम का राग अलाप कर मेरा मकसद देश की आज़ादी के जश्न की खुशियों में खलल डालना हरगिज़ नहीं है लेकिन जब हम इतने भव्य स्तर पर जश्न की तैयारियों को देखते हैं और इस तस्वीर को देखते हैं तो सवाल अपने आप उठने लगते हैं. 

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दरअसल एक तस्वीर मुझे आज नज़र आयी जिसे कोलकाता का बताया जा रहा है. तस्वीर में एक बच्चा कचरे की बोरियों का इतना बोझ उठाये हुए सड़क पर जाता नज़र आ रहा जो बहुत सी कहानियों को जन्म देती है. तस्वीर फेक भी नहीं है और न ही फोटोशॉप की गयी है, एकदम असली है देश के असली हालातों की तरह. तस्वीरें बोलती हैं, यह बात इस तस्वीर को देखते हुए बिलकुल सच साबित हो रही है. यह छोटा बच्चा अपने कमज़ोर कन्धों पर कचरे की बोरियों का बोझ नहीं बल्कि गरीबी का बोझ उठाये दिख रहा है, सरकारी दावों को यह तस्वीर आईना दिखा रही है कि हम जश्न में भले डूबे हैं मगर इस बच्चे के जीवन की असलियत यही है. इसके लिए आज़ादी के जश्न के कोई मायने नहीं, इसे तो बस देश में फैली गन्दगी में से अपने लिए रोज़ कुछ ऐसा समेटना है जिससे उसके जीवन की गाड़ी रुके नहीं, रेंगती रहे। 

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इस तस्वीर को राजनीतिक रंग दिया जा सकता है, विपक्ष की साज़िश बताया जा सकता है, आज़ादी के जश्न के रंग में भंग डालने की कोशिश कही जा सकती है।  तस्वीर को चूंकि कोलकाता का बताया जा रहा है इसलिए ममता बनर्जी पर सवाल उठाये जा सकते हैं, ममता पर भाजपा ही सवाल उठा सकती है. भाजपा सवाल उठाएगी तो ममता भी मोदी को घेरेंगी, आज़ादी के अमृत महोत्सव पर सवाल उठाएंगी। खैर हमारा मकसद किसी तरह की राजनीतिक बहस को छेड़ना नहीं है और न ही आज़ादी के जश्न के रंग को फीका करना है. जश्न मनाइये, मनाना भी चाहिए। तिरंगा फहराइए, फहराना भी चाहिए मगर इस तरह की तस्वीरों को भी नज़रअंदाज़ मत कीजिये और हो सके तो कुछ ऐसा कीजिये कि ऐसी तस्वीरें नज़र न आएं वरना सवाल तो मन में उठेगा ही कि आज़ादी का यह कैसा जश्न?

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