यह है विविध भारती। अब आप सुनिए छाया गीत। छाया गीत सुनने वालों को कमल शर्मा का नमस्कार। रेडियो पर सुनाई देने वाली इस आवाज और अंदाज को भला कौन भूल सकता है। भरी दोपहर में कहीं नीम के पेड़ की छांव तले तो कहीं चौबारे पर। घरों की छत से लेकर मेहमानों के कमरे तक बजने वाला रेडियो कभी सांसों की तरह दिल के करीब ही धड़का था। बदले दौर में भले ही रेडियो की धड़कनें कहीं थम सी गई हैं लेकिन पुरानी पीढ़ी की यादों में आज भी रेडियो के तारों की जनजनाहट जिंदा है। वर्ल्ड रेडियो डे पर इन हस्तियों ने साझा की रेडियो की वह यादें जो उनकी जिंदगी का हिस्सा रह चुकी हैं।
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पीढ़यों का रिश्ता है रेडियो से
टेलिविजन और फिल्मों के जाने माने निर्माता निर्देशक सिद्दार्थ नागर ने अपने करियर की शुरुआत बचपन में रेडियो से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट ही की थी। 1979 में अपने ही पैसों से सिद्दार्थ ने पहला पॉकेट रेडियो खरीदा था जिसकी कीमत थी 40 रुपए। तक उन्हें मेहनताने के तौर पर कभी दो रुपए तो कभी पांच रुपए मिला करते थे। सिद्दार्थ कहते हैं कि उस दौर में मेरा छोटा सा रेडियो हर वक्त मेरी जेब में रहता था। मैंने रिडयो खासकर कमेंट्री और गाने सुनने के लिए लिया था। जब हम रिहर्सल में होते थे बीच में मौका निकाल कर फट से रेडियो कान में लगा कर स्कोर सुन लिया करते थे। वैसे रेडियो से तो मेरी पीढ़ियों का रिश्ता है। मेरे नाना अमृत लाल नागर आकाषवाणी में थे। मेरी मां अचला नागर रेडियो में अनाउंसर हुआ करती थीं। मेरे नाना कुमुद नागर रेडियो पर ड्रामा प्रोड्यूसर थे। तो रेडियो से तो मेरा मजबूत रिश्ता है।

टीवी के जितना बड़ा रेडियो था
लुका छिपी, बत्ती गुल मीटर चालू, बजरंगी भाईजान जैसी फिल्मों में काम कर चुके अदाकार अतुल श्रीवास्तव बतातें हैं कि
उस वक्त हमारे घर में टीवी नहीं थी लेकिन टीवी के जितना बड़ा रेडियो था। शाम को मेरी मां का जब प्रोग्राम आता था पूरा घर उस रेडियो के पास बैठ कर सुनता था। जब हम कमरों में चले जाते थे तो मैं ट्रांजिस्टर पर कभी हवा महल तो कभी बिनाका गीत माला सुना करता था। अब तो रेडियो की जगह दूसरी चीजों से ले ली है। लेकिन मेरी मां आज भी रेडियो सुनती हैं और पुरानी यादों को सहेजे हुए हैं।
दिल्ली में खरीदा था पहला रेडियो
मेरे घर में एक बड़ा सा विदेशी रेडियो हुआ करता था। जिसे मां बाबूजी और दूसरे घर वाले मिलकर सुना करते थे। कभी गाने तो कभी कहानियां। कभी खबरें तो कभी कमेंट्री। रेडियो की आवज दिनभर घर में गूंजती थी। फिर अमीन बीएनए से पासआउट होकर दिल्ली गया तो वहां मैंने अपना पहला छोटा सा रेडियो खरीदा था। क्योंकि मुझे गाने सुनने का बेहद शौक था। उस वक्त मैं रेडियो के बिना रह ही नहीं पाता था। गानों के अलावा अमीन सयानी का फिल्मी मुकदमा आता था वे जरूर सुनता था। गीतमाला, हवा महल बहुत सी यादें हैं रेडियो की जेहन में।

माँ अचला नागर आशा भोसले के साथ
दुकानों में भी गायाब है रेडियो की रौनक
बसंत सिनेमा हॉल जो अब सिर्फ पहचान के लिए बाकी है के पास भारत रेडियो की शॉप हुआ करती थी। दुकान तो आज भी है लेकिन शॉप पर कहीं रेडियो नजर नहीं आते। पूछने पर पता चलता है कि करीब तीस साल पहले यहां रेडियो की शॉप हुआ करती थी अब सिर्फ नाम है, लेकिन काम बदल चुका है।यह सिर्फ एक ही शॉप की बात नहीं कभी जिस रेडियो को खरीदने और बनवाने के लिए लम्बी लम्बी कतारें लगा करती थीं, आज उन शॉप्स की सूरत बदल चुकी है। खास बात यह है कि कहीं रेडियो की जगह एफएफ रेडियो, डीवीडी, सीडी ने ले ली है तो कहीं एयरबैग, दूसरे एलेक्ट्रानिक गुड्स और दूसरे बिजनेस ने ले ली है।

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रेडियो सुनने के लिए लाइसेंस
सुनकर थोड़ा अजीब जरुर लग सकता है कि किसी दौर में रेडियो स्टैट्स सिम्बल हुआ करते थे और उसके शौकीनों को रेडियो रखने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। जेरार्ड, टेलीफंकन, जर्मन शेर्फड, क्रेडिक यह वो ब्रांड है जो उन दिनों पॉपुलर हुआा करते थे। जहां पहले कुछ खास घरानों की जागीर रेडियो हुआ करते थे वहीं एक दौर वो आया कि रेडियो हर घर की जरुरत बन गया। बीबीसी सिलोन, बिनाका गीतमाला, तब्सरा, रेडियो नाटक, नौटंकी और अब सबकुछ सिमट कर एफएम बन कर रेडियो लोगों की पॉकेट में आ चुका है, मगर चार्म आज भी बरकारार है। यही नहीं कुछ रेडियो के चाहने वाले ऐसे भी हैं जिनके पास पुराने रेडियो का कलेक्शन है। राजाजी पुराम में रहने वाले हसन जैसे के कलेक्शन में विनटेज रेडियो मौजूद हैं। हसने ने बताया कि वह आज भी रेडियो सुनना पसंद करते हैं और अपने पुर्खों के कुछ रेडियो को उन्होंने सहेज कर आज भी रखा है।

