विश्व एड्स दिवस – 1 दिसंबर

मेरठ रीजनविश्व एड्स दिवस - 1 दिसंबर

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  • झोलाछाप चिकित्सक बांट रहे एड्स, गिरफ्त में 10 फीसदी मरीज
  • टीबी और रक्त जांच के बाद मरीजों में हो रहा चौंकाने वाला खुलासा

गरिमा जोशी

मेरठ – गांव -देहात में झोलाछाप चिकित्सकों से इलाज कराना युवाओं को काफी महंगा साबित हो रहा है।सस्ते इलाज के चक्कर में युवा एड्स जैसी खतरनाक बीमारी की गिरफ्त में जकड़ रहे हैं। ये चौंकाने वाले खुलासे रक्त और टीबी की जांच रिपोर्ट में हुए हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में कई मामले ऐसे अब तक सामने आ चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हर वर्ष तकरीबन 10 फीसदी एड्स के मामले इसी तरह से मिल रहे हैं। स्थिति काफी चिंताजनक है। जागरूकता के अभाव में कई जिंदगियां मौत के मुहाने आ खड़ी हुई हैं।

नहीं लग रही बीमारी की भनक

लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज में एआरटी सेंटर के चिकित्सक बताते हैं कि शुरुआत में मरीजों को बीमारी की जानकारी नहीं होती । रक्तदान के दौरान या टीबी के मरीजों में अनिवार्य एड्स की जांच में पॉजिटिव आने पर उन्हें पहली बार अपने भीतर पनप रहे एड्स रोग का पता चलता है। शुरुआती चरण में मरीज इस रोग से ग्रस्त होने की बात स्वीकार तक नहीं करते हैं। ऐसे में काउंसलर और अन्य विशेषज्ञ काउंसलिंग कर उन्हें बीमारी और इलाज के बारे में समझाते हैं। गांव -देहात के लोगों में इस तरह की समस्या अधिक है। मरीज बुखार और अन्य बीमारी में विशेषज्ञ चिकित्सक की बजाए आसपास के झोला छाप चिकित्सकों से इलाज करवाने पहुंचते हैं। यहां साफ सफाई और संक्रमण से बचाव के पूरे उपाय नहीं मिलते हैं। अधिकतर मामलों में दूषित सिरिंज का प्रयोग और दूषित रक्त बीमारी के मुख्य कारण बनते हैं।

टूट रहे घर

मेरठ के गांव लिसाड़ी निवासी मरीज सुधाकर( बदला हुआ नाम) बताते हैं की करीब दो वर्ष पहले बुखार आने पर गांव के ही एक कथित चिकित्सक से इलाज करवाया था। उन्हें कुछ दवा और इंजेक्शन दिए थे। बुखार तो कुछ दिन में ठीक हो गया था लेकिन दो तीन महीने बाद से उन्हें थकान, कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होने लगे थे। वजन भी गिर रहा था। जांच करवाई तो एड्स रोग की पुष्टि हुई। बीमारी का नाम सुनकर ही वह डर गए थे। लगा था जीवन यही समाप्त हो गया है। किसी तरह घरवालों को जानकारी दी लेकिन उनकी बीमारी किसी ने स्वीकार नहीं की। पत्नी अलग हो गई। हालांकि सुधाकर ने हार नहीं मानी। इलाज करवाया। अब उनकी स्थिति काफी ठीक है। ऐसे ही कहानी पुट्ठा गांव के 23 वर्षीय कमल (बदला हुआ नाम) की है। रक्तदान शिविर में रक्त दान करने गए थे। रक्त देने के कुछ दिन बाद उन्हें अस्पताल से फोन आया। पता चला एड्स से पीड़ित हैं। शादी होने में कुछ ही दिन बाकी थे। होने वाली पत्नी को ये बात बताई। बीमारी की बात सुनकर वधु पक्ष ने रिश्ता ही तोड़ लिया। सुधाकर और कमल की तरह अन्य मरीज़ भी इसी तरह की समस्या झेल रहे हैं।

इलाज है मददगार

चिकित्सक बताते हैं कि एड्स की पुष्टि होने पर इलाज इसमें काफी मददगार है। एड्स लाइलाज़ जरूर है लेकिन इसे दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है। जिससे मरीज सामान्य लोगों की तरह ही जीवन यापन कर सकता है। 18 महीने के कोर्स के जरिए शरीर से वायरस का वायरल लोड कम किया जाता है। जीवन शैली बदलकर और सही इलाज के जरिए बीमारी काबू की जा सकती है।

इसलिए मनाया जाता है दिवस

हर वर्ष 1 दिसंबर को वर्ल्ड एड्स दिवस का आयोजन दुनिया भर में होता है। सबसे पहले 1988 में इसका आयोजन हुआ था। एड्स एक दूसरे से फैलने वाला रोग है। इसे लेकर समाज के कई मिथक फैले हुए हैं। इसके कारणों और इलाज को लेकर भी समाज में जागरूकता नहीं है। एड्स को लेकर खुलकर बात नहीं होती है जिसके चलते मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है। आंकड़ों के अनुसार देश में 3.6 करोड़ लोग इससे पीड़ित हैं। इस बीमारी के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से ही इसका आयोजन किया जाता है। इस वर्ष लेट कम्युनिटीज मीट थीम पर इसका आयोजन किया जायेगा।

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