प्रियंका वाड्रा की चायवालियों से चर्चा पर चायवाला क्यों परेशान?

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प्रियंका वाड्रा की चायवालियों से चर्चा पर चायवाला क्यों परेशान?

  • नवेद शिकोह
प्रियंका वाड्रा की चायवालियों से चर्चा पर चायवाला क्यों परेशान?

“चायवाला” जुमला भाजपा की पिछली चुनावी कामयाबियों का सबब बना था और अब असम चुनाव में सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस ने चाय वालियों को अपना अहम मुद्दा बनाया है। असम सूबा देश-दुनिया में चाय के लिए मशहूर है। चाय के बाग़ानों में चाय की पैदावार में महिला मजदूरों की अहम भूमिका है। भारी संख्या में इन महिला मजदूरों जिन्हें अस्ल चाय वालिया भी कहा जा सकता है, इनके हालात ठीक नहीं हैं। इनकी न्यूतम मजदूरी इतनी कम है कि रोजी-रोटी की बुनियादी जरूरतें भी ठीक से पूरी नहीं हो पातीं। भाजपा ने पिछले चुनाव में मजदूरी की रकम बढ़ाने का वादा किया था जो पूरा नहीं हुआ। कांग्रेस ने इस बार असम में जिन पांच गारंटियों की घोषणा की है उनमें चायवालियों (बागान में काम करने वाली महिला मज़दूर) की 365 रूपये की न्यूनतम मज़दूरी प्रमुख है.

चाय वालियों की आर्थिक तंगी और परेशानियों को मुद्दा बनाकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी यहां की चुनावी नैया पार करना चाहती हैं। महिलाओं से घुल-मिल कर उनकी समस्याओं से दो-चार होकर उनसे दिली रिश्ता कायम करने में कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका माहिर हैं। इसलिए ही किसान आंदोलन से जुड़ी यूपी की किसान पंचायतों का सिलसिला रोक कर प्रियंका वाड्रा ने असम चुनाव पर फोकस किया। ज़ाहिर सी बात है कि इस घनिष्टता से मोदी का विचलित होना ज़रूरी है क्योंकि चाय का पेटेंट तो उनके पास है और इसीलिए असम दौरे पर उन्होंने इस मुद्दे को यह कहकर कि एक चाय वाला ही चाय वाले का असली दर्द समझ सकता है. अब उनकी इस बात के भी दो अर्थ निकाले जा सकते हैं कि वह चाय बागान के मज़द्दोरों के दर्द की बात कर रहे थे या चाय बागान के मालिकों का दर्द।

बहरहाल बात प्रियंका गाँधी की हो रही है जो पहली बार यूपी के बाहर सक्रिय रूप से राजनीतिक मंचों और मैदानों पर उतरी हैं. असम वो अपने भाई राहुल गांधी से ज्यादा मुखर दिखीं। वो असम की चाय वालियों के मुद्दों को लेकर चाय वाला फेम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शिकस्त देने की जद्दोजहद में लगी हैं ।

पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस को भाजपा शासित असम में ज्यादा स्कोप नज़र आया। यहां भाजपा को चुनौती देने के लिए कांग्रेस ने एड़ी-चोटी का दम लगा दिया। भाजपा को टक्कर देने के लिए भाई-बहन की जोड़ी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी-व गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी आपने सामने रही। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा बतौर स्टार प्रचारक भाजपा सरकार की नाकामियों को लेकर हमलावर रहीं। सीएए मुद्दे के साथ चाय बागानों की मेहनतकश महिला मजदूरों की कम मजदूरी और गरीबी को लेकर प्रियंका मुखर रहीं। असम चुनाव में राहुल गांधी से ज्यादा प्रभावकारी प्रियंका नज़र आ रही हैं ।

उत्तर प्रदेश में कांगेस की उजड़ी जमीन को हरा-भरा करने के लिए पसीना बहा रहीं पार्टी महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा पांच राज्यों के चुनाव का दारोमदार भी संभाले हैं। पश्चिम बंगाल में प्रियंका ने भले ही अभी तक कोई चुनावी रैली नहीं की पर वहां प्रधानमंत्री की सभाओं के संबोधन को लेकर वो ट्वीट वार करती रहती हैं। असम में प्रियंका के तूफानी दौरौं के बाद केरल और अन्य राज्यों की राज्य इकाइयों ने भी प्रियंका गांधी को अपने राज्य में चुनाव प्रचार के लिए बुलाने की मांग की थी।

बहरहाल कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी बड़ी जिम्मेदारियां संभाल कर राजनीति में सक्रिय होने के बाद भले ही किसी मोर्चे पर सियासी सफलता हासिल नहीं कर पायीं पर आज भी पार्टी उन्हें डूबते को तिनके का सहारा मान रही है।

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