लखनऊ। Uttar Pradesh Assembly Elections| पश्चिमी यूपी में दो चरणों के मतदान के बाद अब 20 फरवरी को 16 जिलों की 59 सीटों पर होने वाले मतदान को लेकर पारा हाई हो चुका है। जाटलैंड से होते हुए राजनीतिक पारा अब यादवलैंड और बुंदलेखंड की ओर आ गया है। तीसरे चरण में अखिलेश यादव, शिवपालय यादव, एसपी सिंह बघेल समेत कई दिग्गजों की साख दांव पर लगी हुई है। तीसरे चरण की 59 सीटों पर होने वाले चुनावों के पिछले आंकड़ों को देखें तो भारतीय जनता पार्टी ने 2017 में सपा और बसपा की पकड़ को बुरी तरह कमजोर किया है। जबकि, माना जाता है कि यहां पर एससी-एसटी और ओबीसी खासकर यादवों का प्रभाव यहां ज्यादा है। यादवों को समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक माना जाता है, इसके बाद भी भाजपा ने इस गढ़ में अपना परचम फहराया था। इस बार यानी 2022 के चुनाव में 59 सीटों पर कुल 627 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जिन जिलों मे वोटिंग होनी है उनमें फिरोजाबाद, हाथरस, एटा, कासगंज, मैनपुरी, फर्रूखाबाद, कन्नौज, इटावा, औरैया, कानपुर नगर, कानपुर देहात, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा हैं। इन जिलों में करीब दो करोड़ 15 लाख 75 हजार 400 वोटर हैं। जिसमें एक करोड़ 16 लाख 12 हजार 10 पुरूष, 99 लाख, 62 हजार 324 महिला और एक हजार 96 ट्रांसजेंड हैं।
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जिसका पलड़ा भारी, वो लखनऊ का राजा
साल 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यहां की 59 सीटों में से 37 सीटों पर विजय पताका फहरायी थी। जिसमें कानपुर नगर की पांच, कन्नौज, औरैया, इटावा और फिरोजाबाद की तीन-तीन, मैनपुरी की चार, एटा की छह सीटें थीं। बसपा ने भी यहां दूसरे नंबर पर रहते हुए 10 सीटें अपने नाम की थीं और वहीं भाजपा को आठ सीटें मिली थीं। इसके बाद मोदी की लहर में 2017 में हुए चुनाव में आठ सीटों पर अटकने वाली बीजेपी 45 सीटें अपने नाम कर लेती है। जबकि, सपा को आठ और बसपा व कांग्रेस को एक-एक सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।
मुस्लिम फैक्टर कमजोर
एमवाई फैक्टर के बल पर यूपी में चार बार सरकार बना चुकी सपा के लिए तीसरा चरण इसलिए मुश्किल माना जाता है, क्योंकि यहां पर मुस्लिम आबादी बहुत कम है। मात्र पांच जिले कन्नौज, कानपुर नगर, फर्रूखाबाद, फिरोजाबाद और हाथरस ही हैं जहां मुस्लिमों की आबादी ठीक-ठाक मानी जाती है। इसके बाद भी भाजपा ने 2017 में इन जिलों में अपना परचम फहराया था।
दलित वोट बैंक की स्थिति निर्णायक
तीसरे फेज में अनुसूचित जाति व जनजाति का वोटबैंक करीब 25 फीसदी माना जाता है। यहां पर 15 सीटें सुरक्षित हैं। ऐसे में एससी-एसटी का झुकाव भी सियासी समीकरण बदल सकता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में कभी बसपा भी बेहद मजबूत मानी जाती रही है। अगर एससी-एसटी का वोट पाने में बसपा कामयाब होती है, तो यहां के सियासी परिणाम भी बदल सकते हैं।

