पश्चिमी यूपी: घबराहट तो दोनों तरफ है

विधानसभा चुनावपश्चिमी यूपी: घबराहट तो दोनों तरफ है

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पश्चिमी यूपी: घबराहट तो दोनों तरफ है

अमित बिश्‍नोई

उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर पश्चिमी उत्तरदेश में सियासी घमासान अब अपने उरूज पर पहुँच रहा है, इस युद्ध के दो मुख्य दलों भाजपा और सपा-रालोद के शूरवीर अब रण में पूरी तरह उतर चुके हैं. पैंतरेबाज़ी और उनकी काट शुरू हो चुकी है. दोनों ही सेनाएं इस युद्द का महत्त्व समझती हैं तभी तो अपने सबसे प्रभावी योद्दाओं को मैदान में उतारा है। अंदाज़ा इसी से लगा लीजिये कि देश का गृह मंत्री और प्रदेश का मुख्यमंत्री घर घर जाकर पर्चे बाँट रहा है.

पिछले चार पांच चुनावों में इस क्षेत्र में लगभग एकछत्र राज्य करने वाली भाजपा को यहाँ इस बार संकट से गुज़रना पड़ रहा है, इलाके की जातियों का ताना बाना जो पिछले दो चुनावों में बिखर सा गया था इसबार संवरता हुआ लग रहा है और सत्ताधारी पार्टी के लिए यही सबसे बड़ा संकट है, जाति समीकरण के इस ताने बाने में सुधार भाजपा की राजनीति को बिलकुल सूट नहीं करता। यही कारण है कि ध्रूवीकरण राजनीति के माहिर अमित शाह और योगी आदित्यनाथ को खुद सड़कों पर उतरना पड़ रहा है, प्रधानमंत्री जी भी एक दो दिन में वर्चुअली जुड़ने वाले हैं. सत्ताधारी दल पिछले चुनावों में अपने आज़माये हुए हथियारों को नयी धार देकर एकबार फिर आज़मा रहा है, उसे लगता है कि इलाके में चुनावी रण जीतने के लिए यही सबसे कारगर हथियार हैं, अन्य विकास गाथाओं का गान शायद प्रधानमंत्री जी के श्रीमुख से होगा, हालाँकि तड़का तो उसमें भी ध्रुवीकरण का होगा?

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अमित शाह की निगरानी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में भाजपा की जो गतिविधियां रही हैं उससे एक बात तो साफ़ है कि सत्ताधारी पार्टी को रालोद का सपा के साथ जाना परेशान कर रहा है, भाजपा को शायद पहले चरण के चुनाव में सपा से उतना खतरा नहीं जितना चौधरी चरण सिंह की विरासत वाली इस किसान पार्टी से है. सभी जानते हैं कि चौधरी चरण सिंह की सियासत क्या थी, उनकी लोकप्रियता और सफलता का राज़ क्या था. इलाके में एक शब्द “मजगर” बहुत फेमस है, मजगर मतलब मुस्लिम, अहीर,जाट और राजपूत। चौधरी साहब इन्ही लोगों की सियासत करते थे, सियासत की यह विरासत छोटे चौधरी यानी अजीत सिंह को मिली और उन्होंने भी इस मजगर वाली राजनीती को काफी संभाला मगर मुज़फ्फरनगर के दंगों ने इस मजगर के फॉर्मूले को छिन्न भिन्न कर दिया और भाजपा ने मौके पर चौका मारते हुए मजगर को ख़त्म कर साम्प्रदायिकता और ध्रूवीकरण के फॉर्मूले को सफलता की कुंजी बना लिया जिसने भाजपा को देश और प्रदेश में बुलंदी तक पहुँचाने में एक सीढ़ी का काम किया।

मगर समय पलटा, देश में ऐतिहासिक किसान आंदोलन हुआ जिसने देश, विशेषकर उत्तर प्रदेश और उससे भी बढ़कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत को पलटकर रख दिया है, सामाजिक ताना बाना फिर सुधरा और मजगर भी फिर साँसे लेने लगा है. यही वजह है कि भाजपा इस इलाके में घोड़े खोले हुए है. हालाँकि ऐसा नहीं है कि घबराहट सिर्फ भाजपा में है, किसानों के दो बेटों में भी है जो अपनी विरासत को पाने के लिए एक साथ आये हैं. दोनों ही दलों में टिकट बंटवारे को लेकर सबकुछ ठीक नहीं, असंतोष की लहरें हैं यही वजह है अखिलेश और जयंत को मुज़फ्फरनगर में एक साथ मंच पर आकर बताना कि “आल इज़ वेल’, सब चंगा सी, कोई असंतोष नहीं, जो था उसे ख़त्म कर दिया।

चुनावी रणनीति की बात करें तो रालोद अपने मजगर के हिट फॉर्मूले पर कायम है, उम्मीवारों के चयन में भी इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है, वहीँ अगर सपा को देखा जाय तो वह भाजपा को इसबार ध्रूवीकरण करने का कोई मौका नहीं देना चाहती, यही वजह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस क्षेत्र में जहां हिन्दू-मुसलमान की सियासत काफी मुखर रही है, उसने उम्मीदवारों के चयन में मुस्लिम उम्मीदवारों से काफी दूरी बनाई है, हालाँकि बताया जा रहा है कि सपा के इस पैंतरे से मुस्लिम वोटर आहत हैं मगर बकौल एक सपा प्रवक्ता यह मुसलमानों से दूरी नहीं बल्कि पार्टी की सोची समझी रणनीति है. उनके मुताबिक सपा का रालोद से गठबंधन है, इसलिए उम्मीदवारों को सिर्फ सपा या रालोद का उम्मीदवार नहीं समझना चाहिए, सपा प्रवक्ता की बात सारी कहानी बयान कर देती है.

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मतदान को अब बहुत ज़्यादा समय नहीं बचा है, नेताओं के ज़मीनी और हवाई (वर्चुअली) दौरे तेज़ होंगे, दौरे तेज़ होंगे तो एक दूसरे पर हमले भी तेज़ होंगे, हमले तेज़ होंगे तो दोनों खेमों में घबराहट भी तेज़ होगी। अब देखना यह होगा कि कौन इस घबराहट से पार पाता है.

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