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पंजाब निकाय चुनाव में हार भाजपा के लिये चेतावनी

आर्टिकल/इंटरव्यूपंजाब निकाय चुनाव में हार भाजपा के लिये चेतावनी

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पंजाब निकाय चुनाव में हार भाजपा के लिये चेतावनी

कृषि कानूनों को लेकर किसानों की नाराजगी पड़ गयी भारी
यूूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव भी हो सकते हैं प्रभावित

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। पंजाब में हुए निकाय चुनाव के परिणामों ने जहां कांग्रेस को रिकार्ड जीत दिलाई है वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिये भी अप्रत्याशित यह नतीजे आने वाले संकट की चेतावनी दे रहे हैं। पंजाब निकाय चुनाव में आज घोषित परिणामों के अनुसार सात नगर निगमों में से छह पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया है।

इन निगमों की कुल 350 सीटों में से 268 सीटें जीतने में कांग्रेस ने कामयाबी हासिल की है। पंजाब निकाय चुनाव में भाजपा जहां चैथे स्थान पर पहुंची वहीं अबोहर, बठिंडा और कपूरथला में तो पार्टी का खाता भी नहीं खुला। भाजपा का गढ़ माने जाने वाले इलाकों में भी भाजपा प्रत्याशियों की हार बदलते राजनीतिक परिदृश्य की ओर संकेत दे रहे हैं।

अब तक कृषि कानूनों के विरोध में उतरे किसानों को चंद क्षेत्र के किसानों तक सिमटा होने की बात कहने वाले भाजपा नेताओं को भी अब किसान आंदोलन को गंभीरता से लेना होगा। क्योंकि पंजाब से हुई विरोध की आग पश्चिम यूपी के चुनाव को भी प्रभावित कर सकती है। वहीं पंजाब में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं ऐसे में निकाय चुनावों में मिली जीत निःसंदेह उसके नया उत्साह और आशाएं प्रदान करेंगी।

पंजाब निकाय चुनाव में हार भाजपा के लिये चेतावनी

पंजाब निकाय चुनाव में 6 नगर निगमों अबोहर, बठिंडा, बटाला, पठानकोट, होशियारपुर, कपूरथला में कांग्रेस को बहुमत मिला और मोगा में भी 20 सीटें हासिल कर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। अभी मोहाली का परिणाम आना बाकी है लेकिन उम्मीद जताई जा रही है कि कांग्रेस को वहां भी सफलता मिलेगी। शिरोमणी अकाली दल को भी आशातीत सफलता नहीं मिली लेकिन वह दूसरा बड़ा दल बनने में कामयाब रहा। वहीं आम आदमी पार्टी के विकास माॅडल को भी पंजाब की जनता ने नकार दिया। लेकिन पंजाब निकाय चुनाव के परिणामों ने निःसंदेह भाजपा को अचंभित करने के साथ आशंकित भी कर दिया होेगा। भले ही भाजपा के दिग्गज इस बात को न मानेे लेकिन कृषि कानूनों को लागू करने की हठधर्मिता पंजाब चुुनाव में उस पर भारी पड़ गयी है। पठानकोट, होशियारपुर और बटाला जिन्हें भाजपा का गढ़ माना जाता था वहां भी चंद सीटों पर ही मिली जीत भाजपा को परेशान कर रही होगी।

निकाय चुनावों को किसी भी प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है। हालांकि निकाय चुनाव के मुद्दे स्थानीय होते हैं और प्रत्याशी भी जाना-पहचाना चेहरा होता है। वहीं विधानसभा चुनाव प्रदेश के बड़े मुद्दों पर लड़ा जाता है। लेकिन यह भी तय है कि निकाय चुनाव जनता के रूख को प्रदर्शित करते हैं। निकाय चुनाव में मिली जीत विधानसभा चुनाव में कामयाबी हासिल करने का रास्ता दिखाती है। यही कारण है कि हैदराबाद में हुए निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। मतदाताओं के घर और उनके मन तक पहुंच कर उनके वोट को अपने पाले में खींचने के लिये भाजपा ने निकाय चुनाव को भी लोकसभा चुनाव की तरह लड़ते हुए दिग्गजों को चुनावी मैदान में उतारा था। भाजपा को इस प्रयास में सफलता भी मिली और वह राज्य में दमदार उपस्थिति दर्ज कराने मेें कामयाब रही। लेकिन पंजाब निकाय चुनाव में मिली हार दर्शाती है कि भाजपा ने न केवल अपना जनाधार खोया है बल्कि उसकी नीतियों ने कांग्रेस को मजबूत करने में मदद ही की है। यह जीत कांग्रेस को किसान आंदोलन को और आगे ले जाने के लिये प्रेरित करेगी। और कांग्रेस जितना आगे बढ़ेगी भाजपा के लिये मुश्किलेें भी उतनी ही बढ़ती जायेंगी।

पंजाब में मिली हार से सबक लेते हुए भाजपा को अपनी नीतियों में बदलाव करना आवश्यक है। कोई भी सरकार कितनी ही सशक्त क्यों न दिख रही हो लेकिन चुनाव में उसका भविष्य जनता ही तय करती है। हार भले की निकाय चुनाव की हो लेकिन यह बड़ी हार की शुरूआत के रूप में भी देखी जा रही है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव होने जा रहे हैं और किसान आंदोलन के जोर पकड़ते जाने के साथ वेस्ट यूपी के किसान भाजपा के खिलाफ होते जा रहे हैैं। वहीं पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी अगले साल होंगे। पंजाब और उत्तर प्रदेश की आत्मा किसान को माना जाता है। ऐसे में यदि आत्मा ही नाराज रही तो भाजपा के लिये सत्ता सिंहासन तक का सफर तय करना मुश्किल हो जायेगा।

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