मेरठ। कभी देश और प्रदेश की पार्टी नंबर वन रही कांग्रेस का विधानसभा चुनाव ( Vidhan Sabha Chunav) में बुरा हाल हुआ है। सिर्फ उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में ही नहीं बल्कि गोवा, उत्तराखंड, पंजाब और मणिपुर में पार्टी की दुर्गति हुई है। लड़की हूं लड़ सकती हूं नारा देकर प्रदेश में सड़कों पर पार्टी के लिए वोट मांगतीं दिखी प्रियंका का भी जादू मतदाताओं पर नहीं चल पाया। खुद प्रियंका को भी यह विश्वास नहीं रहा होगा कि पार्टी के प्रत्याशियों की इतनी बुरी हालत हो सकती है। पश्चिमी उप्र में तो पार्टी प्रत्याशी सैकड़ा अंक के भीतर ही सिमट कर रह गए। कांग्रेस के पहले मुख्यमंत्री उप्र में गोविंद बल्लभ पंत थे। उसे बाद 1989 में प्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी रहे। 1989 के बाद से लगातार पार्टी की दुर्गति प्रदेश में होती जा रही है। सैकड़े से दहाई और अब दहाई से भी कम पर आकर कांग्रेस सिमट गई है।
सीट और वोट शेयर दोनों के मामले में ही कांग्रेस कमजोर होती जा रही है। 1985 कांग्रेस को 269 सीटें मिली थीं। उस समय कांग्रेस का वोट प्रतिशत 39.25 था। उप्र में कांग्रेस की यहीं सबसे बड़ी जीत थी। उसके बाद 1989 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 94 सीटें मिलीं। इस चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर 27.9 पर पहुंच गया। वर्ष 1991 के विस चुनाव में कांग्रेस 46 सीटों पर सिमट रह गई और वोट प्रतिशत भी गिरकर 17.32 तक पहुंच गया। उसके बाद से निरंतर पार्टी की हालत खराब होती जा रही है। 2017 में कांग्रेस और सपा गठबंधन के साथ मैदान में थी। कांग्रेस इस चुनाव में 114 सीटों पर लड़ी। लेकिन महज 7 सीटों पर ही जीत दर्ज की जा सकी।
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2022 के विधानसभा चुनाव ( Vidhan Sabha ) तक प्रदेश में कांग्रेस के मात्र तीन विधायक ही बचे थे। उनमें प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के अलावा दिग्गज कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा और तीसरे नंबर पर थे कानपुर कैंट से सोहेल अख्तर अंसारी। लेकिन जिस तरह से चुनावी मतगणना के दौराान कांग्रेस प्रत्याशी निचले पायदान पर है। उससे यही लगता है कि ये कांग्रेस के लिए बड़े भारी दिन हैं।

