देहरादून। Uttarakhand Vidhansabha Chunav – राज्य बनने के बाद से चुनाव विधानसभा का हो या फिर लोकसभा का। उत्तराखंड का मतदाता ने चुनाव में कभी आंख बंदकर वोट नहीं किया किया। राज्य का मतदाता विकास और राष्ट्रीय मुददों के हितों को देखकर ही वोट करता है। प्रदेश में विकास की बात करें तो 2000 में जब से उत्तराखंड अपने अस्तित्व में आया है उसके बाद से इस प्रदेश को विकास के पंख लगे हैं। लेकिन उत्तराखंड के इस विकास में यहां के लोगों को बहुत अहम योगदान रहा है। यहां के वोटर देखने में भले ही ग्रामीण दिखते हो लेकिन समझ अपने गांव से लेकर दिल्ली तक की रखते हैं। यहीं कारण है कि क्षेत्र का विधायक हो या फिर सांसद अगर उसने वोटरों से आंख फेरी तो उसको खामियाजा हार के रूप में भुगतना पड़ा है। यहां के मतदाता नकारा उम्मीदवार या नेता को सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहते।
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विकास के पैमाने पर खरा नहीं तो हार निश्चित :
उत्तराखंड के मतदाताओं में जागरूकता दिखाई देती है। मतदाता चुनाव के दौरान ऐसे नेताओं को गांव में भी नहीं घुसने देते जो कि विकास के पैमाने पर खरा नहीं उतरता। अगर किसी वजह से पार्टी से टिकट लेकर खड़े भी हुए तो ऐसे लोगों की हार निश्चित होती है। 2000 से अब तक हुए चुनावों में उम्मीदवार मतदाताओं का रूख भलीभांति पहचान चुके हैं। कुछ को मतदाताों ने झटका दिया तो उनको सबक भी मिला। उत्तराखंड का मतदाता अपनी उम्मीदों पर दल और प्रत्याशी को पूरी तरह से परखता है। इस बात को अब राजनैतिक दल भी समझते हैं। यहीं कारण है कि वे यहां के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए विकास के कार्यों के अलावा राष्ट्रहित में किए कार्यों को भी गिनवाते हैं। कुछ ऐसे मुददे भी हैं जो कि राष्ट्रीय होने के बाद भी यहां के मतदाताओं को प्रभावित करते रहे हैं। इन मुददों को उत्तराखंड में उठाना और मतदाताओं के बीच जाना राजनैतिक दलों की मजबूरी होता है। सरकार कोई भी हो जनता की अदालत में वह तभी मजबूती से खड़ी हो सकती है अगर विकास की कसौटी पर वह खरी उतरी हो।
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इन राष्ट्रीय मुददों से प्रभावित हुआ वोटर
उत्तराखंड का वोटर पिछले कई साल में उठे राष्ट्रीय मुददों और घटनाओं से काफी प्रभावित हुआ है। बात चाहे नोटबंदी की रही हो या फिर स्वच्छ भारत अभियान की। नमामि गंगे जैसे राष्ट्रीय मिशन से उत्तराखंडवासी काफी प्रभावित हुए और इसका असर इस चुनाव में देखने को जरूर मिलेगा।

