- मायावती के बीजेपी के साथ जाने के एलान में नया क्या ?
- मज़बूत कांग्रेस सभी पार्टियों का सर दर्द बन गयी है
अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश में सर्दी के मोसम की आमद है मोसम का पारा नीचे गिर रहा है लेकिन राज्य सभा और उप चुनाव के कारण सियासत का पारा ऊपर चढ़ रहा है I राज्य सभा के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के विधायकों की बगावत और उनका समाजवादी पार्टी से पेंगें बढ़ाना मायावती को एक बड़ा झटका है तो दो बार उन्नाव से कांग्रेस के तिक्त पर चुन आर लोक सभा पहुँचने वाली अन्नू टंडन का अचानक कांग्रेस से इस्तीफ़ा विशेषकर तब जब उन्नाव जिला की बांगर मऊ सीट पर उप चुनाव हो रहा है जहां से प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री और कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्व पंडित गोपी नाथ दीक्षित की बेटी आरती दीक्षित चुनाव लड़ रही है और जिसको सभी सियासी पंडित और वरिष्ट पत्रकार भी कांग्रेस की सब से मज़बूत सीट मान रहे हैं I पोलिंग से केवल चार दिन पहले पार्टी छोड़ कर अन्नू टंडन ने उस पार्टी को झटका दिया है जिस ने उनको दो बार सांसद बनाया खुद अन्नू टंडन ने कहा है की उन्हें पार्टी के केन्द्रीय नेत्रित्व से कोई शिकायत नहीं है लेकिन प्रदेश कांग्रेस में उनकी सुनवाई नहीं होती है I यह इस्तीफ़ा देने का कोई ठोस कारण तो नहीं हो सकता लेकिन सियासत के अपने खेल होते है लेकिन मैं कल बांगर मऊ में ही था अन्नू टंडन के इस्तीफे पर लोगों की प्रतक्रिया जानने की कोशिश की तो अधिकतर लोगों का कहना था की जनता ने अब एक मन बना लिया है इस चुनाव पर उनके इस्तीफे का कोई असर नहीं पडेगा वैसे भी वह जिला कांग्रेस को अपनी जेब में रखती थीं जिससे बहुत से कार्यकर्ताओं में रोष था और यह कार्यकर्ता अब और अधिक मेहनत कर के उनके द्वारा पार्टी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश को असफल कर देंगे I
लेकिन सब से दिलचस्प सियासी करवट ली गयी है लखनऊ में मायावती के बागी विधायकों ने I यह विधायक उनके राज्य सभा के उम्मीदवार के प्रस्तावक भी थे अचानक क्यों बागी हो गए यह गहराई से सोचने का विषय है I क्योंकि यदि उन्हें उम्मीदवार से शिकायत होती या उन्हें लगा था कि बीजेपी की मदद से मायावाती अपने उम्मीदवार को जीता रही है जिसके वह विरोधी हैं तो उन्हें प्रस्तावक ही नहीं बनना चाहिए था, और उसी वक़्त अपना विरोध दर्ज आरा देना चाहिए था, लेकिन एक बार प्रस्तावक बन के इस तरह पलटी मारना सियासत भले ही हो शराफत तो नही है I ऐसा लगता है की उनका प्रस्तावक बनना भी एक बड़ी साज़िश का हिस्सा था जो भी उनको नचा रहा था उसका ख्याल था की जब प्रस्तावक अपना प्रस्ताव वापस ले लेंगे तो पर्चे की जांच के समय पर्चा खारिज हो जायेगा इस तरह मायावती अपने उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतार पायेंगी और आज़ाद उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिया जाएगा अब एन मौके पर यह आजाद उम्मीदवार किस ने खडा किया था यह किसी से ढका छुपा नहीं है मगर पर्चा ख़ारिज न होने से इन साज़िश कर्ताओं का सारा खेल बिगड़ गया I
मायावती उसे समाजवादी पार्टी की साजिश समझ रही हैं नाराज़ हो कर उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और एलान किया की सामाजवादी पार्टी को हराने के लिए वह बी जे पी की हिमायत कर सकती हैं I वैसे भी बीजेपी से मायावती की नजदीकी कोई ढकी छुपी बात नहीं है न सिर्फ तीन बार उसके साथ मिल कर वह सरकार बना चुकी हैं बल्कि हर कड़े वक्त में उसके साथ खड़ी भी हुई है यहाँ तक गुजरात के चुनाव में वह मोदी की मदद के लिए भी अपने मंत्री हाजी याक़ूब कुरैशी को ले कर गयी थी I इतने सारे हालात हो गए जनता सड़कों पर उतर आई पुलिस ने उनके खिलाफ क्रूरता और बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं बहन कुमारी मायावती ने उसके खिलाफ विरोध जताना तो दरकिनार मुंह खोलना भी पसंद नही किया I सियासी गलियारों में यह बात खुले आम कही जाती है कि दोनों माया और मुलायम लालू नहीं बनना चाहते इस लिए खुल कर मोदी योगी का विरोध नहीं करते हैं उनका जो भी विरोध है वह महज़ खानापूरी है I
मायावती के इस एलान से किसी को हैरत नहीं हुई वैसे भी अब मायावती की वह सियासी हैसियत नहीं रह गयी है जो कभी हुआ करती थी उनके वोट बैंक को बीजेपी ने हथिया लिया है अब उनके साथ कुछ पक्के आंबेडकर वादियों को छोड़ कर कोई वोट बैंक नहीं बचा है मुसलमानों में भी उनकी पॉपुलैरिटी बहुत घट गयी है बी जे पि के साथ खुले आम जाने का एलान कर के उन्हो ने इस दूरी को और बढ़ा दिया है वह असम्बली में चुनाव में भले ही ज्यादा मुसलमानों को टिकट दें लेकिन उनकी इस चाल को भी मुस्लिम वोट बाँट कर बीजेपी के फायदा पहुंचाने की साज़िश समझा जाएगा I उत्तर प्रदेश से बाहर खासकर बिहार के चुनाव पर इसका असर अवश्य पड़ेगा ख़ासकर ओवैसी की पोजीशन बहुत खराब हो जाएगी क्योंक ओवैसी मायावती और उपेन्द्र कुशवाहा से गठजोड़ कर के चुनाव लड़ रहे है मायावती ने खुल के बीजेपी से साथ जाने की बात कह दी है और कुशवाहा जो मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्य रह चुके हैं वह भी चुनाव बाद किधर चले जायेंगे कुछ नहीं कहा जा सकता I
उधर अखिलेश यादव जो अब तक साफ़ सुथरी सियासत करने के लिए जाने जाते थे अब वह अपने पिता और चाचा ( जिन से अब उनका छत्तीस का आंकडा है ) की धोपी पाट वाली सियासत करते दिख रहे है न केवल बसप के बागियों से उनकी मुलाकात से यह साफ़ इशारा मिलरहा है बल्कि कांग्रेस की बागी अन्नू टंडन ने भी बीजेपी या सामजवादी पार्टी में जाने का इशारा दिया है I
उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव डेढ़ साल बाद होगा मगर सभी पार्टियों ने इसकी तयारी शुरू कर दी है मायावती ने बीजेपी से गठजोड़ का इशारा दे दिया है अखिलेश और उनके नाराज़ चाचा शिवपाल यादव में मेल मिलाप की खबरें आ रही है जबकि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी और प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू के नेत्रित्व में जन समस्याओं को ले कर प्रतिरोध और सर्कार से टकराव लाठियां खाने मुकदमे झेलने की सियासत कर के अवाम के दिलो में जगह बनाई है और तीस साल में पहली बार न केवल सियासी गलियारों गांवो की चौपालों और शहरों के चायखानों में सियासी बहसों में अपनी हैसियत मनवा ली है और अब कांग्रेस के धुर विरोधी भी प्रदेश में एक सियासी ताक़त मान रहे है I कांग्रेस की यह मजबूती ही सभी पार्टियों की नींद उडाए है I उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव में जबर्दस्त मुकाबला देखने को मिलेगा I

