भाजपा का साथ निभाना मायावती की मजबूरी!

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भाजपा का साथ निभाना मायावती की मजबूरी!

दलित वोट बैंक में हो गयी सेंध, मुस्लिम मतदाताओं से बनी दूरी
सपा का साथ निभाने से नहीं हुआ लाभ, कांग्रेस से जारी हैं तल्खियां

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। बसपा प्रमुख मायावती अब खुलकर भाजपा का समर्थन करने का ऐलान कर चुकी हैं। मायावती के इस फैसले ने 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तस्वीर को बदल कर रख दिया है। यदि भाजपा को मायावती के सहारे खुद से दूर हो चुके दलित वोट बैंक का सहारा मिला तो फिर से सत्ता सिंहासन पर काबिज होना उसके लिये आसान हो जायेगा।

वहीं अपने दलित वोट बैंक में लगी सेंध से परेशान मायावती को मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिलता नहीं दिख रहा। ऐसे में राजनीति में खुद को बचाये रखने के लिये मायावती का भाजपा का साथ देना मजबूरी है। 27 साल में 5 बार गठबंधन कर चुकी मायावती के लिये भाजपा का साथ देना कोई नयी बात भी नहीं है। लेकिन मायावती के इस कदम से विपक्षी दलों में बैचेनी जरूर पैदा हो गयी है।

भाजपा का साथ निभाना मायावती की मजबूरी!

दलित राजनीति को नये आयाम देने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती दलित वोट बैंक के सहारे उत्तर प्रदेश के सत्ता सिंहासन पर भी काबिज रह चुकी हैं। एक समय था जब मायावती का वोट बैंक अन्य विपक्षी दलों के मुकाबले अधिक एकजुट था। 2007 में मायावती सोशल इंजिनियरिंग का फाॅर्मूला अपनाते हुए दलित और सवर्णों वोटरों को एक साथ लाकर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को महज 80 सीटें ही मिल पायीं। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की लहर के चलते बसपा को एक भी सीट नहीं मिली।

2017 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा को निराशा ही मिली और 2012 की 80 सीटों से सिमटकर वह मात्र 18 सीटों पर ही जीत दर्ज करा सकी। सत्ता से दूर हो चली बसपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया मगर मायावती के नेतृत्व में बसपा को मात्र 10 सीटें ही मिल पायीं।
बसपा की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। बसपा के मूल वोट बैंक में भीम आर्मी ने सेंध लगाई औैर दलितों को एकजुट करना शुरू कर दिया। वहीं कांग्रेेस ने भी भीम आर्मी को अपने पाले में खींचने का पुरजोर प्रयास किया।

भीम आर्मी केे चंद्रशेखर जब मेरठ के आनंद अस्पताल में भर्ती थे तो प्रियंका गांधी खुद उनसे मिलने पहुंची थी। हालांकि दोनों ही ओर से किसी राजनीतिक सहमति का ऐलान नहीं किया गया था मगर भीम आर्मी से कांग्रेस की नजदीकियां बसपा को खटक गयी थी। तल्खियों के बीच बसपा और कांग्रेस में आरोप-प्रत्यारोपों के तीर चलते रहे और दूरियां बढ़ती गयीं।

वहीं साल 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले बसपा अध्यक्ष मायावती ने 26 साल पहले 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड में समाजवादी पार्टी के खिलाफ दर्ज केस वापस ले लिया था। मगर लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा तो एकजुट हो गये मगर उनके मतदाताओं के मन नहीं मिल पाये। बसपा ने उस समय भी समाजवादी पार्टी के मतदाताओं पर साथ न देने का आरोप लगाया था। वहीं दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाने का प्रयास कर रही बसपा का मुस्लिम वोट बैंक खिसककर समाजवादी पार्टी की ओर चला गया। यानि गठबंधन करने से मायावती को नुकसान ही रहा।

2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को जहां दलित वोट बैंक को बचाये रखने की चुनौती का सामना करना है वहीं मायावती इस बात को अच्छी तरह से जानती है कि सिर्फ दलित वोट बैंक के सहारे सत्ता सुख भोगना मुश्किल हैं। वहीं कांग्रेस से तल्खियां और सपा से बनी दूरियां उसको गठबंधन में शामिल होने से रोक रही हैं। इन हालातों में मायावती के पास सिर्फ भाजपा का साथ निभाने का ही विकल्प बचता है।

इस परिस्थितियों को बसपा प्रमुख ने काफी पहले ही भांप लिया था। यही कारण है कि कई मौकों पर बसपा प्रमुख ने अघोषित तौर पर भाजपा का साथ निभाया। वहीं भाजपा ने भी बसपा का साथ निभाया और यूपी में राज्यसभा की खाली हुई दस सीटों में से सिर्फ 8 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। बसपा ने भी अपना कैंडिडेट उतारा तो साफ हो गया कि बसपा भाजपा के समर्थन से अपना प्रत्याशी राज्यसभा में भेजना चाहती है। तभी जाहिर हो चला था कि पर्दे के पीछे से दिया जा रहा समर्थन जल्द ही सबके सामने आ सकता है।

यूपी में राज्यसभा की खाली हुई सीटों पर बसपा प्रत्याशी की जीत के आगे रोड़ा बनने वाली समाजवादी पार्टी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हुई मगर मायावती का साथ उससे जरूर छूट गया। बसपा प्रमुख मायावती ने ऐलान कर दिया है कि वे एमएलसी चुनाव में भाजपा का समर्थन करेंगी और उनके मतदाता सपा प्रत्याशी को हराने का काम करेंगे। यह कोई बदले की भावना से लिया गया निर्णय नहीं है बल्कि बसपा के राजनीतिक हालातों को देखते हुए रणनीति का हिस्सा है।

भाजपा और बसपा के वोटर आसानी से एकजुट हो सकते हैं। ऐसे में राजनीति के रसाताल की ओर जा रही बसपा को फिर से संजीवनी मिल सकती है। मायावती जानती हैं कि दलित और मुस्लिम गठजोड़ के भरोसे वह बहुत आगे नहीं जा सकती है। क्योकि बसपा के मुकाबले मुस्लिम मतदाता सपा की ओर जाना ज्यादा पसंद करता है।

हालांकि बसपा और भाजपा के बीच गठबंधन होने की स्थिति में अधिक लाभ भाजपा को होता दिख रहा है। क्यूंकि इस कदम से भाजपा से नाराज दलित मतदाता अप्रत्यक्ष या अनमने मन से ही सही मगर भाजपा का साथ जरूर निभाएगा। वहीं मायावती को भी दलितों को यह समझाना होगा कि भाजपा के साथ जाने से दलितों को लाभ मिलेगा। यदि मायावती ऐसा कर पायीं तो निःसंदेह 2022 का चुनाव विपक्षी दलों के लिये काफी मुश्किल साबित हो सकते है।

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