कार्यकर्ताओं के तिरस्कार की वजह से हारे यूपी, समीक्षा बैठक में सामने आया सच

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लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा की दुर्दशा क्यों हुई, इसका सच अब सामने आ गया है. ये सच हार के बाद भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्षों की समीक्षा बैठक से सामने आया है जो कल शाम राजधानी लखनऊ में आयोजित हुई थी. दिल्ली से भेजे गए राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष के सामने क्षेत्रीय अध्यक्षों ने हार के कई कारण गिनाये, जिनमें सबसे प्रमुख कारण सांसदों का कार्यकर्ताओं और जनता के प्रति व्यवहार था, समीक्षा बैठक में ये भी सामने आया कि सांसद प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की कार्यशैली से भी काफी नाराज़ थे, हालाँकि ये बात दुसरे तरीके से कही गयी. भाजपा नेताओं ने कहा कि इन सांसदों के पास जब कोई कार्यकर्ता काम के लिए जाता था तो उसे कहा जाता था कि प्रधानमंत्री मोदी से बात करो, उनसे मिलो। दूसरे शब्दों में कहें तो हार की सबसे बड़ी वजह कार्यकर्ताओं का तिरस्कार बताई गयी.

बैठक से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक एक क्षेत्रीय अध्यक्ष तो बहुत नाराज़ दिख रहे थे, वो उम्मीदवार के चयन पर दुखी भी थे. इन महाशय का कहना था कि जिस उम्मीदवार को जिला संगठन के नेताओं का नाम तक नहीं मालूम वो कैसे चुनाव जीत सकता है. वो जिस तरह संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ अपमान भरा व्यवहार कर रहे थे, उससे तो उनकी हार सुनिश्चित थी। पार्टी ने कई ऐसे उम्मीदवारों को उतारा जिन्हें लग रहा था कि सिर्फ मोदी जी और योगी जी के नाम पर नैया पार लग जाएगी, इसलिए परिश्रम करने से क्या फायदा। ये लोग चुनाव के दौरान प्रचार के लिए 11 बजे से पहले कभी घर से बाहर ही नहीं निकलते थे भले उनका कार्यक्रम सुबह आठ बजे का लगा हो ऐसे में कार्यकर्ताओं को बड़ा अपमान झेलना पड़ता था.

इस बैठक में हार का एक कारण ये भी सामने आया कि यूपी सरकार में नौकरशाही इतनी हावी हो चुकी है कि बड़े से बड़े पार्टी नेता की नहीं सुनी जाती। वो किसी कार्यकर्ता या जनता का कोई काम लेकर शासन तक पहुँचता तो कोई सुनवाई नहीं होती जिसकी वजह से कार्यकर्ताओं में काफी हताशा पैदा हो गयी गयी और चुनाव के दौरान उनमें कोई जोश नज़र नहीं आया. इसके अलावा भ्रष्टाचार भी हार की एक वजह के रूप में सामने आया, समीक्षा बैठक में शामिल नेताओं ने कहा कि चाहे तहसील हो या फिर थाना, बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता ऐसे में क्षेत्रीय नेताओं पर से जनता का भरोसा भी कम होता गया क्योंकि उनका कोई काम बिना पैसे के नहीं हो रहा है. गलत टिकटों का बंटवारे की बात भी सामने आयी, कहा गया कि आला नेताओं को उम्मीदवारों के बारे में फीडबैक दिया गया लेकिन उसपर कोई विचार नहीं किया गया और नतीजा हार के रूप में सामने आया.

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