यूपी चुनावी दंगल 2022: किस पर होगा दलितों का वार, हर दल बेकरार

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यूपी चुनावी दंगल 2022: किस पर होगा दलितों का वार, हर दल बेकरार

यूपी में दलितों की आबादी बदल सकती है तस्वीर, मतदाता शांत, राजनीतिक दलों में उथल-पुथल

अमित बिश्‍नोई

यूपी चुनावी दंगल 2022उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों की आबादी हमेशा से ही बड़ा रोल निभा रही है। खास तौर से इन विधानसभा चुनावों को लेकर दलित मतदाता पर हर राजनीतिक दल की निगाहें टिकी हैं। लेकिन दलित वोटर ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। पश्चिमी यूपी को मथने के लिए राजनीतिक दलों के मुखिया से लेकर प्रधानमंत्री- मुख्यमंत्री लगातार दौरे कर रहे हैं। भाजपा व सपा-रालोद गठबंधन आमने-सामने की टक्कर ले रहे हैं। बावजूद इसके दलित वोटर किस करवट बैठेगा इसका अंदाजा फिलहाल किसी को नहीं है।

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20 फ़ीसदी आबादी रखती है हार जीत का दम

प्रदेश में खास तौर से पश्चिमी यूपी को दलित बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है। 20% आबादी राजनीतिक दलों की हार जीत तय करने का दम रखती है। यही वजह है कि चुनावी समर में इस बार हर दल इन्हें रिझाने के लिए मैदान में उतरा है। यही नहीं दलित मतदाता भी अपने वजूद को बखूबी समझ रहे हैं। पूर्व के चुनाव इस बात के गवाह हैं कि दलितों की ताकत के चलते बसपा सरकार कई बार मजबूती के साथ आगे बढ़ी है। आगरा, मेरठ, अलीगढ सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर गाजियाबाद जैसे कई क्षेत्रों में दलित मतदाताओं की संख्या सैकड़ों में है। हालांकि बात सियासी मिजाज की करें तो अभी तक दलितों के मूड को कोई भांप नहीं पाया है। दलित विकास के मुद्दों की बात करने लगे हैं। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि दलित वोटर कई धड़ों में बट सकता है।

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बदल रहे युवाओं के मुद्दे

दलित मतदाता भी अब विकास की राह पकड़ना चाहते हैं। एक पार्टी की बंधे बंधाए टैबू से निकलकर रुख बदलने के लिए तैयार हैं। प्रत्याशी मैदान में हैं लेकिन दलितों को अपना दामन थमाने में किसी को कामयाबी नहीं मिल रही है। सियासी पंडित मानते हैं कि इस बार चुनावों का मुकाबला सीधे-सीधे भाजपा और सपा गठबंधन के बीच होगा। दलितों के मुद्दे भी बदल रहे हैं। दलित मतदाता किस ओर रुख करेगा इसका मंथन जारी है। बड़ी आबादी वाला दलित वर्ग पूरी तरह सोच-विचार में जुटा हुआ है। वहीं राजनीतिक दल भी इन्हें लुभाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सपा, बसपा, कांग्रेस या भाजपा सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सियासी गणित बैठाने की जुगत में है। जबकि दलित वोटर तस्वीर बदलने की तैयारी में जुटा है।

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