मेरठ। यूपी चुनावी दंगल 2022 – कोविड 19 के प्रोटोकाल के तहत चुनाव प्रचार इस समय चरम पर है। निर्वाचन आयोग ने हालांकि प्रचार के लिए अनुमति तो दी है। लेकिन इस प्रचार को भी वर्चुअल तरीके से ही प्रत्याशी और दल कर सकते हैं। ऐसे में पूरे पांच साल तक चुनाव का इंतजार करने वाले प्रिटिंग प्रेस व्यापारी इस बार खाली बैठे हैं। प्रिटिंग प्रेस व्यापारियों का कहना है कि एक तो पहले से ही कोरोना संक्रमण के कारण व्यापार पूरी तरह से ठप था। अब दूसरी ओर रही सही कसर निर्वाचन आयोग की आचार संहिता ने पूरी कर दी है। व्यापारियों को अनुमान था कि विधानसभा चुनाव में उनका पुराना घाटा पूरी तरह से भर सकता है। इसकी तैयारी भी प्रिंटिंग प्रेस व्यापारी काफी समय से कर रहे थे। लेकिन जब निर्वाचन आयोग के आचार संहिता का चाबुक चला तो इससे प्रिटिंग प्रेस व्यापारियों को तगड़ी चोट लगी है। वर्चुअल चुनाव प्रचार में तकनीकी की मांग बढ़ी तो टैबलेट और मोबाइल के बाजार में बूम आया। लेकिन इस नई व्यवस्था ने प्रिंटिंग प्रेस कारोबारियों के चेहरे की रौनक छीन ली है।
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कारोबारियों का कहना है कि चुनाव में उन्हें मोटा व्यापार होने का अनुमान था इस कारण प्रिंटिंग प्रेस व्यापारियों ने लाखों रुपये का माल मंगवाकर पहले से रख लिया था। उन्हें पता था चुनाव की घोषणा के बाद मोटा आर्डर मिलेगा। लेकिन आचार संहिता ने उम्मीदवारों को ऐसा जकड़ लिया कि वे उससे बाहर नहीं निकल सकते। मेरठ में कई बड़ी छोटी मिलाकर करीब 100 प्रिटिंग प्रेस हैं। इनमें करीब 20 बड़ी हैं। जिनके पास चुनाव के समय 30 से 40 लाख रुपये का आर्डर मिल जाता था। लेकिन इस बार हालात यह हैं कि किसी प्रत्याशी से अब तक 1 लाख रुपये का भी आर्डर नहीं मिला है। जो कुछ आर्डर पहले मिले थे वो पार्टियों के वर्चुअल प्रचार तकनीक के कारण रदद कर दिए गए हैं।
2017 के विधानसभा चुनाव रहे हो या फिर 2019 के लोकसभा चुनाव मेरठ के प्रिटिंग प्रेस व्यापारियों को मेरठ ही नहीं आसपास के जिलों से भी फ्लैक्स और बोर्ड के बड़े आर्डर मिले थे। इन दोनों चुनाव में कारोबार काफी ठीकठाक रहा था। आर्डरों की इतनी भरमार हो गई थी कि उनको पूरा करने के लिए 24 घंटे तीन शिफ्टों में काम चला था। लेकिन इस बार एक शिफ्ट चलानी भी भारी पड़ रही है।
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प्रिंटिंग प्रेस संचालकों का कहना है कि कोई भी चुनाव पांच साल बाद आता है। जिसका वे लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसमें स्टीकर, पोस्टर ,बैलेट पेपर नमूना, फ्लैक्स तक के बड़े काम मिलते हैं। इस बार वर्चुअल प्रचार के साथ ही मोबाइल ने प्रत्याशियों का काम आसान कर दिया है।

