Twin Tower Corruption: अरबों का टर्न ओवर और 34 कंपनियां के मालिक इस व्यक्ति ने भ्रष्ट्राचार के बल पर खड़ा किया था ट्विन टावर,जानिए पूरी कहानी

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नोएडा। दिन में ढाई बजते ही मात्र 10 सेंकेड में 200 करोड रुपये से अधिक के ट्विन टावर जमीदोज हो गए। देश के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी इमारत को जमींदोज किया गया है। ये ट्विन टावर सुपरटेक कंपनी द्वारा बनाया गया था। सुपरटेक कंपनी मालिक का नाम आरके अरोड़ा है। आरके अरोड़ा ने मात्र एक दशक के भीतर 34 कंपनियां खड़ी कर ली। ये कंपनियां कंसलटेंसी,सिविल एविएशन, प्रिंटिंग,ब्रोकिंग, हाउसिंग फाइनेंस,फिल्म्स, कंस्ट्रक्शन के काम करती हैं। बताया तो यहां तक जाता है कि आरके अरोड़ा ने कब्रगाह बनाने तक की कंपनी खोली है। 

 रिपोर्ट्स के मुताबिक आरके अरोड़ा अपने कुछ साथियों के साथ सात दिसंबर 1995 को कंपनी की शुरुआत की थी। कंपनी ने ग्रेटर नोएडा,नोएडा, यमुना विकास प्राधिकरण क्षेत्र, दिल्ली-एनसीआर,मेरठ सहित देशभर के 12 शहरों में रियल स्टेट के प्रोजेक्ट लॉन्च किए थे। देखते-देखते अरोड़ा रियल स्टेट में एक नाम बन गया। इसके बाद अरोड़ा ने लगातार 34 कंपनियां खोलीं। जो कि सभी अलग.अलग कामों के लिए खोली गई थीं।  सुपरटेक शुरू करने के चार साल बाद 1999 में अरोडा की पत्नी संगीता अरोड़ा ने सुपरटेक बिल्डर्स एंड प्रमोटर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम  की कंपनी खोली। इसके अलावा आरके अरोड़ा ने बेटे मोहित अरोड़ा के साथ मिलकर पॉवर जेनरेशन, डिस्ट्रीब्यूशन बिलिंग सेक्टर में काम शुरू किया। सुपरटेक एनर्जी एंड पॉवर प्राइवेट लिमिटेड नाम की भी कंपनी बनाई। 

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ऐसे खड़ी हुई सुपरटेक ट्विन टावर की इमारत:-

कहानी की शुरूआत 23 नंवबर 2004 से होती है। नोएडा अथॉरिटी ने सेक्टर-93 ए में प्लॉट नंबर-4 को एमराल्ड कोर्ट के लिए आवंटित किया था। आवंटन के साथ ही ग्राउंड फ्लोर सहित नौ मंजिल तक घर बनाने की अनुमति दी गई। दो साल बाद 29 दिसंबर 2006 को इसी अनुमति में संशोधन किया गया। नोएडा अथॉरिटी ने सुपरटेक को नौ के स्थान पर 11 मंजिल तक मकान बनाने की अनुमति दी। इसके बाद अथॉरिटी ने टावर बनने की संख्या में इजाफा कर दिया। पहले 14 टावर बनाए जाने थे। लेकिन इनको बढ़कर 16 कर दिया। 2009 में इसमें फिर से इजाफा किया। 26 नवंबर 2009 को अथॉरिटी ने 17 टावर बनाने का नक्शा पास कर दिया। दो मार्च 2012 को टावर 16 और 17 के लिए एफआर में बदलाव किया। इस बदलाव के मुताबिक दोनों टावर को 40 मंजिल तक बनाने कीअनुमति मिल गई। इसकी ऊंचाई 121 मीटर रखी गई। दोनों टावर के बीच की दूरी महज नौ मीटर रखी थी। जबकि, नियम के अनुसार दो टावरों के बीच की दूरी कम से कम 16 मीटर होनी चाहिए।  अनुमति मिलने के बाद सुपरटेक समूह ने एक टावर में 32 और दूसरे में 29 मंजिल तक निर्माण पूरा कर दिया। इसके बाद मामला कोर्ट पहुंचा और ऐसा पहुंचा कि टावर बनाने में भ्रष्टाचार की परतें एक के बाद एक खुलती गईं। जिसके बाद कोर्ट ने दोनों टावर गिराने के आदेश दिए। जो कि आज इतिहास बन गए।

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