तिलक से होती है साधु-संतों के संप्रदाय की पहचान

उत्तराखंडतिलक से होती है साधु-संतों के संप्रदाय की पहचान

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तिलक से होती है साधु-संतों के संप्रदाय की पहचान

सभी संप्रदायों के अलग-अलग होते हैं तिलक

न्यूज डेस्क। हिन्दू धर्म के अनुसार तिलक माथे पर या शरीर के अन्य हिस्सों जैसे हथेली या गर्दन पर लगाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का चिन्ह होता है। भारतीय संस्कृति में तिलक लगाने की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। माथे पर लगे ये तिलक हिन्दू संस्कृति की पहचान माने जाते हैं। हिन्दू धर्म में जितने भी संतों के पंथ, मत व संप्रदाय हैं उन सभी के अलग-अलग तिलक होते हैं। साधु-संतों के माथे पर लगा तिलक उनके चेहरे को गरिमा प्रदान करता है। बेहद सुंदर दिखने वाला और सधे हाथों से लगाये जाने वाला तिलक को देख श्रद्धालु स्वयं ही नतमस्तक हो जाते हैं।

हरिद्वार में होने वाले महाकुंभ 2021 में आपको तरह-तरह के साधु-संतों, सन्यासियों के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होगा। इन साधु-संतों को देखकर यह जानने की इच्छा होती है कि वह किस मत या संप्रदाय से संबंध रखते हैं या किस प्रकार की पूजा पद्धति को वह अपनाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह तिलक साधु-संतो और सन्यासियों के मत या संप्रदाय का परिचय देने के साथ यह भी बताते हैं कि वह किसी देवी-देवता की उपासना करते हैैं। जी हां, यदि आपको इन तिलकों के बारे में जानकारी है तो आप यह भी जान सकते हैं कि साधु-सन्यासी नर्म स्वभाव के हैं या जटिल स्वभाव उनका परिचय है। आइये जानते हैं साधु-संतों के माथे पर लगाये जाने वाले तिलक के बारे में….

माथे पर त्रिपुंड लगाते हैं शैव मत के लोग

शैव मत को मानने वाले साधु-संत अपने माथे पर तीन आड़ी रेखा वाले त्रिपुंड का तिलक लगाते हैं। ये रेखाएं माथे पर बांए से दाएं की ओर जाती हैं। भगवान शिव की अराधना करने वाले शैव मत के सभी साधु-संत इसलिये त्रिपुंड लगाते हैं क्योंकि भगवान शिव के माथे पर भी त्रिपुंड का तिलक होता है। शैव मत के सातों अखाड़ों के साधु-संत माथे पर त्रिपुंड लगाते हैं।

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64 प्रकार के तिलक लगाये जाते है वैष्णव संप्रदाय में

वैष्णवों में तकरीबन 64 प्रकार के तिलक लगाये जाते हैं। प्रमुख तिलक में शामिल लालश्री तिलक में माथे पर चंदन लगाकर उसके बीच में हल्दी या कुमकुम की रेखा बनाई जाती है। विष्णुस्वामी तिलक को लगाने के लिये भौहों के बीच में दो चैड़ी रेखाएं बनाई जाती हैं। रामानंद तिलक से पहले विष्णु तिलक लगाया जाता है इसके बाद उनके बीच में कुमकुम से एक खड़ी रेखा बनाई जाती है। वहीं भगवान श्री कृष्ण के उपासक श्यामश्री तिलक को लगाते हैं, इस तिलक को लगाने के लिये आसपास गोपीचंदन की व बीच में एक काले रंग की मोटी रेखा बनाई जाती है। इस संप्रदाय के साधु-संत राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी की पूजा अर्चना करते हैं।

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श्री संप्रदाय, रामानुज या रामानंदी संप्रदाय

श्री संप्रदाय, रामानुज या रामानंदी संप्रदाय को मानने वाले साधु-संत दो प्रकार तिलक लगाते हैं. पहले तिलक में पीली धरती के साथ सफेद और लाल रंग का लगभग त्रिशुल के जैसा तिलक माथे पर लगाया जाता है। वहीं दूसरे तिलक में त्रिशुल के आकार का सफेद और लाल रंग का तिलक लगाया जाता है। इन संप्रदाय के साधु-संत मां लक्ष्मी, राधा कृष्ण और राम सीता की उपासना करते हैं।

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कुमार संप्रदाय या निम्बार्क संप्रदाय

राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप की पूजा करने वाले कुमार संप्रदाय या निम्बार्क संप्रदाय के साधु- संत भी दो प्रकार का तिलक लगाते हैं। पहला तिलक सुराही की गर्दन जैसा होता है और उसमें एक काली बिंदी लगायी जाती है। दूसरा तिलक विष्णुस्वामियों की तरह ही यू आकार का होता है लेकिन उसके अंदर काले रंग की बिंदी होती है।

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भगवान कृष्ण के उपासक हैं रुद्र विष्णुस्वामी या वल्लभ संप्रदाय

रुद्र विष्णुस्वामी या वल्लभ संप्रदाय को मानने वाले साधु-संत यू आकार का तिलक लगाते हैं। इस तिलक के अंदर नीचे की ओर सफेद रंग की बिंदी होती है। इस संप्रदाय को मानने वाले भगवान कृष्ण की उपासना करते हैं। मान्यता है कि सबसे पहले रुद्र यानि शिव भगवान ने इसकी स्थापना की थी। इसे इसे विष्णुस्वामी संप्रदाय और वल्लभ संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है।

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