सत्ता बदलने के साथ बहुत कुछ बदलने लगता है, माननीयों की आस्थाएं भी बदलने लगती हैं. यह आस्थाएं भविष्य में क्या होने वाला है, कहाँ पर नफा है और कहाँ पर नुक्सान इस बात पर टिक जाती हैं, फिलहाल बिहार में सत्ता पलट चुकी है तो यहाँ आस्थाओं के पलटने की कुछ ख़बरें छन छनकर आनी शुरू हो गयी हैं. ख़बरों को अगर सही मानें तो लोक जनशक्ति पार्टी के पारस गुट के तीन सांसद NDA का दामन छोड़ राजद या जेडीयू के साथ जा सकते हैं. ये सांसद हैं खगड़िया के महबूब अली कैसर, वैशाली से वीणा देवी और नवादा से चंदन सिंह. इनमें से महबूब अली के राजद में जाने की बात हो रही है तो वीणा देवी और चन्दन सिंह के जेडीयू में जाने की बातें।
बता दें कि 2019 में लोक जनशक्ति पार्टी के 6 सांसद चुनाव जीते थे. वहीँ पिछले चिराग़ की अपने चाचा पशुपति कुमार पारस से पार्टी पर कब्ज़े को लेकर अनबन हो गयी, नतीजा यह हुआ कि पार्टी चिराग़ और पारस गुट में बंट गयी, यह अलग बात है कि चिराग़ अकेले पड़ गए और पार्टी के पांच सांसद पारस गुट में चले गए. अपने आप को मोदी जी का हनुमान बताने वाले चिराग़ पासवान ठगे से रह गए. कहा जाता है LJP की इस टूट की कहानी दिल्ली में बैठकर लिखी गयी थी जिसका ज़िक्र इन दिनों भाजपा के चिराग़ मॉडल के रूप में नितीश कुमार ने कई बार किया। नितीश के मुताबिक भाजपा बिहार में एक और चिराग़ मॉडल का खेल खेलने की तैयारी कर रही थी जिसकी जानकारी नितीश को मिल चुकी थी, पशुपति की भूमिका जेडीयू में कभी नंबर दो रहे RCP सिंह निभाने वाले थे लेकिन नितीश ने ऐसा राजनीतिक दांव चला कि भाजपा के सारे मंसूबे धराशाई हो गए।
समय ने करवट बदली तो LJP के अंदर ही पुरानी कहानी दोहराई जाती दिख रही है. LJP के पास 6 सांसद हैं जिसमें तीन साथ छोड़ने वाले हैं , चिराग़ पासवान पहले से ही अकेले हैं इसलिए LJP में हाजीपुर से पारस और समस्तीपुर से प्रिंस ही बचते हैं, चिराग़ को भी शामिल कर लें तो सिर्फ परिवार के लोग ही LJP का नेतृत्व करते दिख रहे हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि LJP में इस टूट के पीछे नितीश और तेजस्वी हैं. LJP में इस टूट को भाजपा पर बड़े हमले के रूप में भी देखा जा सकता है.

