चांदी के टुकड़े को आग के सामने पिघलाते हुए, चांदी के पत्ते को पीटकर आकार देते हुए या फिर घुंघरू और नगों को जड़ती हुई आफिया के हुनर को जो देखता है देखता ही रह जाता है-
रेड, महरून वेलवेट के ऊपर चांदी की नक्काशी के साथ घुंघरू और नंगों से जड़ी चांदी की जूती लखनवी दस्तकारी की खास पहचान है और इस हुनर की विरासत को संभाल रही हैं आफिया खान-
लखनऊ का चौक इलाका, जहां की तंग गलियों में हुनर का खजाना छिपा है। कहीं रेशम के धागों का जाल नजर आता है तो कहीं मुकैश वर्क की कारीगरी लोगों को हैरान कर देती है। यहां की महिलाओं ने लखनऊ की दस्तकारी को नए आयाम दिए हैं। आज बात करते हैं एक ऐसे हुनर की जिसपर सिर्फ पुरुषवर्ग का कब्जा था लेकिन आफिया खान ने इस परम्परा को तोड़ते हुए एक नई इबारत लिखी है। यह हुनर है चांदी की चप्पल बनाने का। पूरे शहर में आफिया अकेली ऐसी महिला हैं जिन्होंने अपने पिता का पुश्तैनी काम को ना सिर्फ संभाला है बल्कि इस हुनर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रही हैं।

दुलहन के लिए बनती है चांदी की चप्पल
नवाबों की नगरी लखनऊ के अंदाज भी नवाबी है। फिर वह चाहे खाना हो या पहनावा। चांदी की जूती भी नवाबी दौर के पहनावे का एक खास हिस्सा हुआ करती थी। वह दौर तो खत्म हो गया लेकिन लखनऊ की नई दुलहन आज भी पांव में चांदी की चप्पल पहनकर अपनी ससुराल में कदम रखती है। यही वजह है कि सुनारों की दुकान पर सोने चांदी के अभूषणों के साथ चांदी की चप्पल भी शादी की शॉपिंग का हिस्सा होती हैं। चौक इलाके से ताल्लुक रखने वाले हाफिज मोहम्मद अशफाक चांदी की चप्पलों के ऐसे कारीगर हैं जिनकी पुश्ते इसी काम को करती आ रही हैं। नौ भाईयों में सबसे छोटे हाफिज मोहम्मद अशफाक 1972 से अपना पुश्तैनी काम कर रहे हैं और अब उनकी इस विरासत को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं उनकी सबसे छोटी बेटी आफिया खान।
चांदी को गलाने से लेकर मार्केट तक का काम
आफिया सुबह सात बजे से अपने घर पर बनी वर्कशॉप पर काम शुरू कर देती हैं। चांदी के टुकड़े को हीट से गलाना, गलने के बाद पत्ते को पीट-पीट कर उसे आकार देना, घुंघरू और नग लगाना, सांचे पर कपड़े को पेस्ट करना सभी काम आफिया बखूबी करती है। आफिया कहती हैं कि अब्बा के साथ अब मैं मार्केट भी जाती हूं। चांदी खरीदना भी अब मुझे आ गया है। इन चप्पलों में हम प्योर और ठोस चांदी का इस्तेमाल करते हैं। सहालग के टाइम काम काफी ज्यादा होता है। शादीयों के सीजन में कई बार सुबह 7 बजे से 11 बजे तक भी मैं काम करना पड़ता है। यह काफी नाजुक और मेहनत का काम है लेकिन मैं अपने इस काम को बहुत इंजाय करती हूं। आफिया कहती हैं कि हमारा पुशतैनी मकान चौक में हैं लेकिन अब हम लोग राजाजी पुरम में रहते हैं और यहीं हमारी वर्कशॉप भी है।

इस काम को कभी सीखा नहीं
ग्रेजुएशन कर चुकीं आफिया कहती हैं कि, मुझे ठीक से नहीं याद कि मेरी उम्र क्या थी जब मुझे अब्ब् के इस काम में दिलचसपी हुइ थी। तीसरी या चौथी क्लास में पुढ़ती थी और अब्बू के पास आकर बैठ जाती थी। वह सुबह से अपना काम शुरू कर देते थे और मैं स्कूल से आते ही अब्बू के पास बैठ कर उन्हें देखा करती थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि मैंने कभी इस काम को सीखा नहीं बल्कि देखते देखते आ गया। अब मैं इसका पूरा काम जानती हूं। मार्केट भी अब मैं देखती हूं। मैंने अपने ब्रांड का नाम रखा है हुनरजादी क्रिएशन।

पुशतैनी हुनर को अपडेट करा है
आफिया कहती हैं कि नवाबों के दौर से चला आ रहा चांदी की जूतियों का चलन अब आम नहीं है। अब इन चप्पलों को दुलहनों के लिए बनवाया जाता है। शहर में आज भी हुनरपसंद और शौकीन लोगों की कमी नहीं है। पहले यह चप्पलें एक सेट डिजाइन और सांचें पर बनी थीं लेकिन मैंने इन्हें काफी अपडेट किया है। पहले एक ही हील होती थी जिसे मैरीजैम हील कहते थे। लेकिन वह मुझे खुद कम्फर्टेबल नहीं लगती थी। आगे पीछे से बराबर मोटी हील होती थी। अब मैंने इन चप्पलों को फ्लैट हील में बनाना शुरू किया है। इन्हें नए-नए डिजाइन देती हूं। अब तो कई लोग मेरे डिजाइन की नकल कर रहे हैं। यह काम भी कस्टमाइज होता है। क्लाइंट को जितने वजन चांदी की चप्पल चाहिए, या फिर किस रंग के नंग जड़ना है क्लांइट की डिमांड पर बन जाता है। कुछ ही दिन पहले आधा किलो चांदी की एक जोड़ी चप्पल हमने बनाई थी। वैसे एक जोड़ी चप्पल में कम से कम दस ग्राम चांदी की जरूरत होती है। इसके बाद अगर क्लांइट चाहे तो वजन को बढ़ा सकता है लेकिन दस ग्राम से कम में नहीं होनी चाहिए। अब हमने हुनरजादी क्रिएशंस को ऑनलाइन भी शुरू कर दिया है।

शुरू में चुनौतियां भी थीं
इस वक्त अपने पिता और भाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हुनरजादी क्रिएशंस को नई पहचान देने वाली आफिया कहती हैं कि जब मैं शुरू में मार्केट में अपने काम को लेकर जाती थी तो लोगों के सवाल परेशान कर देते थे। कोई अब्बू से कहता कि अरे लड़की को इस काम में क्यों लगा दिया? लड़का तो संभाल लेगा। कोई मुझसे पूछता कि अरे यह काम क्यों करती हो घर का काम करना है तुम्हें तो। खाना बनाना भी जानती हो यही काम करती हो? चांदी खरीदने जाती या फिर ऑडर पहुंचाने हर जगह लोग हैरत भरी नजरों से देखते थे। शायद इस लिए भी कि, एक तो इस हुनर के कारीगर ही अब शहर में ज्यादा नहीं है और कभी किसी लड़की ने इस काम को किया ही नहीं। मैं इकलौती लड़की हूं जो इस हुनर को कर रही हूं। अब तो लखनऊ और शहर के बाहर भी एग्जिबीशन में हिस्सा लेती हूं। लोग अब मुझे मेरे इस हुनर की वजह से पहचान रहं हैं।

