ये मेरा किसान नहीं, ये मेरा भगवान नहीं…

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ये मेरा किसान नहीं, ये मेरा भगवान नहीं…

सुनील शर्मा

क्या यह वही किसान है जिसे मैं अन्नदाता कहता था। क्या हाथों में तलवारें लिये पुलिस पर ट्रैक्टर चढ़ाने वाला वही किसान है जिसे मैं असहाय कहता था। क्या पुलिसवालों पर लाठी बरसाने वाले वही किसान हैं जिन्हें मैं कमजोर और पीड़ित कहता था। क्या लालकिले पर चढ़कर झंडा फहरा कर देश को बदनाम करने वाले वही किसान हैं जिन्हें मैं अन्नदाता कहता था। क्या देश के गौरव का प्रतीक माने जाने वाले गणतंत्र दिवस पर लालकिले पर कब्जा करने वाले वही किसान हैं जिनके पैरों में पड़ी बिवाईयों का अहसास कर मेरा मन दुखी होता था। क्या दिल्ली में आतंक फैलाने वाले वही किसान है जो कल तक खुद को अहिंसक कह रहे थे। क्या इन लोगों को मैं किसान मानूं या उससे भी बड़ी बात क्या ऐसा करने वालों को उनके नेता भी किसान मानेंगे। नहीं, मैं ऐसे दंगाईयों को किसान इसलिये नहीं कहूंगा क्योंकि मेरे देश का किसान देश से गद्दारी नहीं कर सकता, उसे दुनिया के सामने इस तरह से और गणतंत्र दिवस पर अपमानित नहीं कर सकता। और ऐसे आतंकियों को उनके नेता भी किसान इसलिये नहीं बतायेंगे क्योंकि इससे उनकी छवि प्रभावित होगी। अब दंगाई कह रहे हैं कि वह किसान हैं, नेता कह रहे हैं कि दंगाई हैं और मैं कह रहा हूं कि यह मेरे देश का किसान नहीं है।

आज दिल्ली में जो तांडव किसानों ने दिखाया उससे देश की बदनामी तो हुई है साथ ही शांतिपूर्ण किसान आंदोलन चलाने का दावा करने वाले कथित नेताओं के चेहरे पर भी कालिख पुत गयी है। किसानों के आंदोलन को हवा देने वाले दिल्ली के सीएम केजरीवाल और कांग्रेस के राहुल गांधी भी अब मुंह छिपाते फिर रहे हैं। राहुल गांधी, योगेन्द्र यादव जैसे नेता जो पहले किसान आंदोलन को हवा दे रहे थे और ट्रैक्टर मार्च को सहमति देने की मांग कर रहे थे वही नेता आज बवाल हो जाने के बाद उपद्रवियों से शांत रहने की अपील कर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। किसानों के तथाकथित नेता राकेश टिकैत दिल्ली की सड़कोें पर बवाल, पथराव, पुलिसकर्मियों पर हमला किये जाने के बाद भी आंदोलन शांतिपूर्ण चलने का दावा करते रहे। लेकिन किसान नेता होने का दावा करने वाले और परम आदरणीय चै. महेन्द्र सिंह टिकैत जैसी शख्सियत के बेटे होने का गौरव पाने वाले राकेश टिकैत इतनी हिम्मत भी नहीं कर पाये कि वह खुद आगे आकर किसानों को रोकने की जिम्मेदारी लेते। हमेशा की तरह वह न्यूज चैनलों के कैमरों के आगे बयान देते ही दिखे। ऐसे नेताओं के जिम्मे चलने वाले आंदोलन का हश्र तो यही होना था।

कल तब जब दिल्ली की सीमाओं पर कब्जा किये बैठे लोगों पर सवाल उठाये गये तो किसान नेता उनको शातिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले भोले-मासूम किसान बता रहे थे। मगर आज जब किसान दिल्ली में घुस आये और हंगामा करने लगे तो किसान नेताओं को उनमें उपद्रवी और विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ता नजर आने लगे। ट्रैक्टर मार्च को शुरू करने वाले किसान नेता अब उन्हीं ट्रैक्टर चालकों को पहचानने और अपना मानने से भी इंकार कर रहे हैं। अब वह कह रहे हैं कि असमाजिक तत्व ट्रैक्टर मार्च में घुस आये। कुछ नेताओं ने तो हद ही कर दी और कहा कि किसानों को दिल्ली का रास्ता नहीं पता था इसलिये वह लालकिले पर पहुंच गये। सवाल यह है कि यदि भूल से पहुंच भी गये तो क्या लालकिले पर झंडा फहराने जैसा शर्मनाक काम भी भूल से कर दिया। दिल्ली पर कब्जा और लालकिले के गौरव को अपने ट्रैक्टरों और संख्याबल के बलबूते रौंदने की हिम्मत भी क्या भूल से कर दी। दिल्ली में घुसने से रोकने वाले पुलिसकर्मियों को लाठी-डंडो से पीटकर घायल भी क्या भूल से कर दिया।

शर्मिंदा हूं कि मैंने ऐसे आंदोलन को समर्थन दिया, शर्मिंदा हूं कि मैंने ऐसे दंगाईयों को असहाय, निर्बल, अपनी मांगों के लिये सर्द रातें सड़कों पर गुजारने वाला देश का किसान समझा। शर्मिंदा हूं कि मैंने भूल से इन्हें धरती का भगवान माना। शर्मिंदा हूं और शर्मिंदा रहूंगा क्योंकि इन कथित किसानों औैर नेताओं ने गणतंत्र दिवस के दिन दुनिया भर के सामने जो देश को अपमानित किया है वह दाग कभी धुल नहीं पायेगा।

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