- दिसंबर के बाकी बचे दिनों में उत्तर प्रदेश में होंगी अनेक राजनीतिक रैलियां
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। चुनाव की तारीखों का ऐलान में लगभग एक महीने का समय बाकी है मगर राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है। उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ रैलियां आयोजित की जा रही हैं। दिसंबर का महीना वैसे तो कड़कडाती सर्दी का होता है लेकिन राजनीतिक दलों का रूख देखते हुए लगता है की इस साल राजनीतिक गर्मी दिसंबर की सर्दी को मात देने में कामयाब रहेगी।
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दिसंबर के बाकी बचे दिनों में राजनीतिक गर्माहट तेजी से बढ़ती दिखेगी। क्योंकि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों की बड़ी-बड़ी रैलियां होने जा रही हैं। बात करें भाजपा की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद दिसंबर महीने में चार बार और उत्तर प्रदेश में आने वाले हैं। वहीं गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भाजपा के मिशन 2022 को सफल बनाने के लिये उत्तर प्रदेश की धरा पर आवाज बुलंद करेंगे। वहीं स्मृति ईरानी, धर्मेंद्र प्रधान, अनुराग ठाकुर सहित अनेक वरिष्ठ भाजपा नेता भी भाजपा के यूपी चुनावी अभियान को रफ्तार देंगे।
बात करें विपक्षी दलों की तो उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा का मुकाबला करने के लिए क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर मजबूत स्थिति में आ रही समाजवादी पार्टी भी दिसंबर में होने वाली ठंड की परवाह करती नहीं दिख रही है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव 17 और 18 दिसंबर को रायबरेली में विजय रथ यात्रा निकाल कर चुनावी माहौल बनाने का प्रयास करेंगे। वही 23 दिसंबर को अलीगढ़ में सपा और रालोद की संयुक्त रैली आयोजित होने जा रही है जिसमें अखिलेश यादव और जयंत चैधरी एक साथ मंच पर मौजूद होंगे। गौरतलब है कि मेरठ के दबथुआ में हुई सपा-रालोद गठबंधन की पहली संयुक्त रैली में अपार जनसमूह उमड़ा था। ऐसे में इस गठबंधन की दूसरी रैली के भी सफल होने के दावे किए जा रहे हैं।
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वही एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी मेरठ में 18 दिसंबर को जनसभा करने जा रहे हैं। ओवैसी के तीखे तेवरों के कारण उनकी रैली में भी जमकर भीड़ उमड़ती है।
यूपी विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होने से पहले सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा और विपक्षी दल सपा, रालोद, कांग्रेस और एआईएमआईएम मतदाताओं का रुख अपनी ओर मोड़ने का हर संभव प्रयास करने में जुट गई है। राजनीतिक दलों की हलचल को देखते हुए यकीनन दिसंबर की सर्दी पर राजनीतिक गर्मी भारी पड़ने वाली है।

