खिले मदिरा प्रेमियों के चेहरे, दुकानों पर लगी रही भीड़

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खिले मदिरा प्रेमियों के चेहरे, दुकानों पर लगी रही भीड़

काफी समय से शराब की दुकानें बंद होने से परेशान थे मदिरा प्रेमी

सुनील शर्मा

मेरठ।
सुन, कलकल, छलछल, मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन-रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।

प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन द्वारा लिखित मधुशाला की यह पंक्तियां आज मदिरा प्रेमियों के मन में छाये अपार हर्ष को व्यक्त कर रही थी। आज लंबे समय के बाद उत्तर प्रदेश में शराब की दुकानों को खोले जाने केे बाद वहां उमड़़ी मयप्रेमियों के चेहरे की खुशी शब्दों में बयां नहीं की जा सकती है। एक ओर जहां लोग ऑक्सीजन सिलेंडर लिये घुम रहे हैं वहीं दूसरी ओर मदिरा प्रेमियों के लिये बोतलों में बंद शराब ही मानो ऑक्सीजन थी जिसके हाथ में आते ही उनके जीवन में बहार आ गयी।

लाॅकडाउन लगने के साथ ही उत्तर प्रदेश में शराब की दुकानों को बंद रखने के आदेश दे दिये गये थे। ऐसे में मदिरा प्रेमियों के लिये यह समय बेहद कठिनाई से गुजरा। सालों से जिस दोस्त को कभी याद न किया हो उसे फोन कर बोतल के लिये टटोला। कहीं ब्लैक में ही जुगाड़ हो जाये, बोतल नहीं तो हाॅफ ही मिल जाये, इसी प्रयास में मयप्रेमी सुबह से ही लग जाते थे। किसी को नींद नहीं आयी तो किसी का दिल घबराया, मदिरा की चाह में जीवन के मानों कोई मतलब ही नहीं रहे। छोड़ दिया करते थे जितनी पैमाने में, आज उतनी भी बाकी नहीं रही मैखाने में जैसे डाॅयलाग मदिरा प्रेमियों के प्यासे कंठ से निकलने लगे।

सोमवार को जैसे ही मदिरा प्रेमियों को पता चला कि मंगलवार से शराब के ठेके खोल दिये जायेंगे उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। किसी ने करवटें बदल-बदल कर रात काटी, तो किसी ने पहली बार सूरज को उगते देखा। शराब की दुकानें खुलने से पहले ही लोेग दुकान के बाहर लाइन लगा कर खडे़ हो गये। दुकानें फिर बंद न हो जाये का डर मन में था तो लोगों ने कई दिनों का कोटा खरीद लिया। लाइनों में लगे उत्साहित लोग बोतल हाथ में आते ही ऐसे खिल जाते थे मानो कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज भी लगवा ली हो।

अब कई दिनों के बाद मदिरा हाथ में आयी तो शाम तक का इंतजार करना कुछ लोगों के लिये भारी था। सो लाॅकडाउन का फायदा उठाया और दोपहर में ही खोल लिया बोतल का ढक्कन। पैग पर पैग चलते रहे और सुरूर बनता रहा। ऐसे ही कुछ लोगों को देखकर मधुशाला की यह पंक्तियां भी याद आ गयीं…

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।

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