सोशल मीडिया की धार और दलित+पिछड़ा लगाएंगे भाजपा की नैया पार

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सोशल मीडिया की धार और दलित+पिछड़ा लगाएंगे भाजपा की नैया पार

धीरज उपाध्याय
उत्तर प्रदेश में 2022 विधानसभा चुनाव में भले ही अभी करीब आठ महीने का समय शेष हैं लेकिन सूबे की सभी पार्टियों ने अपने वोटरों को साधने के लिए राजनीतिक दांव पेंच शुरू कर दिये हैं। इसी के मद्देनजर भाजपा ने पंचायत चुनाव से सबक लेते हुए नए सियासी समीकरण और पिछड़ो को जोड़ने का काम शुरू करने के साथ अपने विगत वर्षो के सबसे विश्वसनीय और प्रमुख चुनावी अस्त्र सोशल मीडिया (Social Media) को धार देने का काम भी शुरू कर दिया हैं।

इस कड़ी में भाजपा ने 2014 से अपने साथ जुड़े दलित और पिछड़ा वोट बैंक को सहेजने के लिए पिछड़ी जाती के नेताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया हैं। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आरएम लाल के अनुसार 2014 लोकसभा चुनाव में ओबीसी का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पाले में आ गया था, जिसका लाभ उसे 2017 और 2019 के चुनाव में भी मिला। इसी के चलते पार्टी विभिन्न जातियों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ मिलाकर रखने का प्रयास कर रही है।

गौरतलब हैं कि बीते दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिल्ली दौरे के समय अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय सिंह के साथ गृह मंत्री अमित शाह की मुलाकात को इसी रणनीति के तहत देखा जा रहा हैं। ये बात सर्वविदित हैं कि उत्तर प्रदेश में अभी भी सभी राजनीतिक दल विकास से ज्यादा जातीय समीकरण को महत्व देते हैं चाहे वो कांग्रेस हो या बेजेपी।

यूपी का जातीय समीकरण
उत्तर प्रदेश में भाजपा की नजर प्रमुख रूप से गैर यादव पिछड़ा (26%) + दलित जाटव वोटरों (11%) पर हैं। पिछले चुनावों में जाटव दलित वोटर (11%) ने भाजपा का साथ दिया था। वहीं पिछड़ा/ गैर यादव (26%) वोट भाजपा के लिए पिछले दो लोकसभा तथा 2017 विधान सभा चुनाव में संजीवनी साबित हो चुका हैं। अगर इसको अलग कर के देखे तो इसमे कुर्मी/ सैथवार 8 फीसदी, जाट 5 फीसदी, मल्लाह 4 फीसदी, विश्वकर्मा 2 फीसदी और अन्य पिछड़ी जातियों की तादाद 7 फीसदी है, जिनके बल पर बीजेपी ने केंद्र ही नहीं बल्कि उप्र की सत्ता में 13 वर्षो बाद वापसी की थी। भाजपा को अपने करीब 23 फीसदी सवर्ण वोटरो की ज्यादा चिंता नहीं जो उसके साथ पिछले दो दशको से तटस्थ हैं। हालांकि करोना के चलते बीजपी से कुछ वोटरों में नाराजगी भी है लेकिन विकल्प के अभाव और राम मंदिर निर्माण में तेजी के साथ पुनः उनके भाजपा की तरफ जाने की संभावना अधिक हैं।

वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी आज अपने ट्वीट से साफ कर दिया हैं कि वो 2022 विधान सभा चुनावों में अकेले उतरेगी और किसी से कोई गटबंधन नहीं होगा। दूसरी तरफ सपा को भी जिला पंचायत चुनाव मे झटका लगा है जिसे पार्टी और उसकी सहयोगी आरएलडी अभी तक विधान सभा चुनाव 2022 से पहले बढ़त (edge) के रूप मे देख रही थी। अखिलेश यादव की पार्टी सपा ही बीजेपी को चुनौती देती दिख रही हैं, लेकिन उन्होने पिछले अनुभवों से सीखते हुए इस बार किसी बड़े दल से गठबंधन करने से इंकार कर दिया हैं।

सोशल मीडिया को धार
भाजपा प्रदेश संगठन के साथ अपनी सोशल मीडिया टीम को भी और विस्तारित करने जा रही हैं। कुछ दिन पहले नए प्रवकताओं को नियुक्त किया गया था। वहीं बीजेपी अब सूबे में अपनी सोशल मीडिया सेल टीम को जिला स्तरीय बनाने जा रही हैं। ये टीम अब मोदी और योगी सरकार द्वारा किए गए कार्यो को विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा जनता तक पहुंचाने के साथ विपक्ष के आरोपो का भी खंडन करने का काम करेगी। भाजपा चुनावों से पहले राष्ट्रवाद तथा सभी मुद्दे जिनसे उसे लाभ मिल सके उसे बढ़ा चढ़ाकर क्षेत्रीय क्लेवर में जनता तक पहुंचाएगी जिसकी मानीटरिंग लखनऊ से होगी।

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम ने लेने की शर्त पर बताया की ‘पार्टी को हिंदू राष्ट्रवाद सूट करता है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस में फिट बैठते हैं और वर्तमान में वो प्रदेश में सबसे बड़ा चेहरा है अतः पार्टी अब उनके नेतृत्व में सूबे में चुना लड़ेगी और 300 का आंकड़ा आसानी से पार करेगी’।

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