टटिया स्थान- जहाँ आज भी है श्री कृष्ण का वास, करते हैं यहीं विश्राम

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आज भी नहीं होता बिजली का प्रयोग, दिए कि रोशनी से होता है रोशन वृंदावन धाम के कण-कण में भगवान श्री कृष्ण बसते हैं। बांके बिहारी की इस पावन नगरी में कदम रखते ही जहां मन को असीम शांति प्रदान मिलती है, वही चारों ओर राधे-राधे के गूंजते स्वर माहौल को पूरी तरह भक्ति में बना देते हैं।वृंदावन धाम का यूँ तो हर एक स्थान अपने आप में विशेष है, लेकिन एक बेहद ही रमणीय और प्राकृतिक स्थान है जिसे टटिया स्थान कहा जाता है। ये स्थान काफी ख़ास है। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण आज भी यहां वास करते हैं। स्थान के अनुयायियों के अनुसार बांके बिहारी मंदिर से भगवान रात में यही विश्राम करने आते हैं। इस स्थान पर पहुंच कर प्रकृति के करीब होने का एहसास होता है। यहाँ दिव्यता और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम स्वयं महसूस किया जा सकता है।

हर पत्ते पर लिखा है राधे-राधे

स्वामी हरिदास जी की तपोस्थली टटिया स्थान में ऐसे कई दुर्लभ दृश्य देखने कोमिलते हैं जो न केवल आश्चर्य उत्त्पन्न करते हैं, बल्कि कण-कण में बांके बिहारी की मौजूदगी का भी प्रमाण देते हैं। इस स्थान पर लगे पेड़ों के पत्तों पर स्वयं राधे राधे अंकित होता है। आश्चर्य की बात है कि यह कोई नहीं जानता कि इसके पीछे क्या राज है पर आज भी यहां पत्ते पत्ते डाली डाली पर राधे-राधे लिखा हुआ देखा जा सकता है। सवामी हरिदास संप्रदाय से जुड़े इस स्थान के दिव्य अनुभूतियां होती है।

टटिया स्थान- जहाँ आज भी है श्री कृष्ण का वास, करते हैं यहीं विश्राम

नहीं होता बिजली का प्रयोग

आधुनिक युग में जहां हर चीज में बिजली से संचालित है। वही यह स्थान कलयुग में भी तकनीकी और आधुनिकता से बिल्कुल परे है। यहाँ दीवारों का बंधन नहीं है, मात्र बांस, खपच्चीयों और टटियाओं से बना हुआ है। जिसकी वजह से इसका नाम टटिया स्थान पड़ा। इस स्थान पर बिजली, मोबाइल सब कुछ वर्जित है। यहाँ तक कि यहाँ पक्के फर्श तक नहीं बने हैं। मंदिर परिसर में सिर्फ़ बालू बिछी है। रात में हर जगह दिए कि रोशनी की जाती है।

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टटिया स्थान- जहाँ आज भी है श्री कृष्ण का वास, करते हैं यहीं विश्राम

संध्या में होती है भजन आरती

टटिया स्थान- जहाँ आज भी है श्री कृष्ण का वास, करते हैं यहीं विश्राम

टटिया स्थान में ठाकुर जी स्वयं विराजमान हैं। यहां साधु- संत विरक्त होकर उनकी भक्ति में लीन रहते हैं। इसका साक्षात प्रमाण यहां होने वाली भजन संध्या में मिलता है। हर दिन साधु संत व हरिदास संप्रदाय के अनुयाई संध्या के समय भजन गाते हैं। इस संध्या में शामिल होने वाले भक्त बताते हैं कि सुर-ताल का ऐसा अनूठा संगम उन्होंने पहले कभी नहीं देखा-सुना। भजनों की धुन और संगीत का जो माहौल यहां बनता है उसे सुनकर ऐसा लगता है जैसे स्वयं ईश्वर वहां उतर आए हो। ऐसे आनंदमय और भक्ति पूर्ण माहौल में हर कोई बस ईश्वर में विलीन हो जाना चाहता है।

आलौकिक है यहाँ हर चीज

टटिया स्थान- जहाँ आज भी है श्री कृष्ण का वास, करते हैं यहीं विश्राम

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टटिया स्थान पर पहुंचने के बाद यहां कण-कण में आलौकिकता को महसूस किया जा सकता है। इसी स्थान पर रहने वाले साधु संतों में अलग ही तेज दिखाई देता है । हरिदास संप्रदाय के महंत आज भी समाधि लेते हैं। इस स्थान पर कुएं के पानी का प्रयोग किया जाता है। भीड़-भाड़ से परे इस जगह पर द्वापर युग को आज भी पूरी तरह से अनुभव किया जा सकता है। कलयुग से बहुत दूर ये स्थान कलियुग में भी द्वापर युग में डूबा हुआ है। इस स्थान के कण-कण में बांके बिहारी बसते हैं चारों ओर राधे-राधे गूंजता है। यहाँ की दिव्यता का एहसास विशेषत: राधा अष्टमी पर किया जा सकता है। उस दिन यहां विशेष आयोजन होते हैं। भंडारा किया जाता है और माहौल पूरी तरह राधा रानी और कुंज बिहारी में डूब जाता है

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