तालिबान-पाकिस्तान-अमरीकी गठजोड़ और भारत की चिंता

आर्टिकल/इंटरव्यूतालिबान-पाकिस्तान-अमरीकी गठजोड़ और भारत की चिंता

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अमित बिश्‍नोई

पाकिस्तान भारत का दुश्मन है, तालिबान पाकिस्तान को अपना दूसरा घर बताता है और अमेरिका पाकिस्तान का पुराना मित्र है जो समय समय पर उसकी आर्थिक मदद करके उसकी आंतकी गतिविधियों को अपरोक्ष रूप से सहायता प्रदान करता रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता पलट के बाद क्षेत्र में यह एक ऐसा त्रिकोण बन रहा है जिसकी नोकें भारत को ज़रूर चुभेंगी। भारत के लिए इन तीनों का संगम एक नयी समस्या और बहुत बड़ी चिंता है. आप कहेंगे कि अमेरिका तो भारत का बहुत गहरा मित्र है. बेशक अमेरिका भारत का गहरा मित्र है मगर जब आप गहराई से नज़र डालेंगे तो पता चलेगा कि अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ हुआ वह अमरीका की एक बहुत बड़ी साज़िश है. वैसे भी कहा जाता है कि अमेरिका किसी का भी सगा नहीं। अपनी सुपर पावर की इमेज को बरकरार रखने के लिए वह बहुत कुछ कर सकता है।

आपको मालूम ही है कि विश्व के मंचों पर भारत की लीडरशिप बढ़ी है, उसकी स्वीकार्यता बढ़ी है, उसकी बातों को गंभीरता से सुना जा रहा है. ज़ाहिर सी बात है कि विश्व गुरु बनने की ओर भारत की बढ़ती रफ़्तार से अमेरिका अंदर ही अंदर विचलित तो होगा ही, अमेरिका कभी नहीं चाहेगा कि दुनिया में एक और सुपर पावर खड़ा हो. ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान एक अवसर के रूप उसके सामने आया और वह पूरी शिद्दत से इसे भुनाने में लगा है. पाकिस्तान और तालिबान को अपनी गोद में बिठाकर भारत के इन पुराने दुश्मनों के कन्धों पर बन्दूक रखकर भारत पर निशाना साधना चाहता है।

अमेरिका की कोशिश है कि परदे के पीछे रहकर वह भारत की बढ़ती हुई रफ़्तार को कम करे, भारत बरसों से पाकिस्तान की आतंकवादी सरगर्मियों से मुकाबला करता आ रहा है और अब कट्टरपंथी और आतंक का दूसरा नाम कहे जाने वाले तालिबान के रूप में दुश्मन पाकिस्तान का एक और सहयोगी सामने आ गया है। तो चिंतित होना एक लाज़मी बात है।

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किसी भी देश की मज़बूती उसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति से होती है. अर्थव्यस्था तो नहीं मगर अफ़ग़ानिस्तान में अरबों डॉलर की कीमत के हथियारों का ज़खीरा छोड़कर उसने तालिबानियों की बहुत बड़ी मदद की है. 30 अगस्त को मुकम्मल तौर से अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से पहले अमेरिकी सेना जो हथियार छोड़कर गयी है उसकी कीमत 85 अरब डॉलर बताई जा रही है। इनमें 200 हैलिकाप्टर, 2000 बक्तरबंद गाड़ियां, विभिन्न प्रकार की 6 लाख 75 हज़ार बंदूक़े और अन्य प्रकार के हथियार शामिल हैं. इसके अलावा काबुल एयरपोर्ट पर लगा एंटी मीज़ाइल सिस्टम, दर्जनों की संख्या में सेना के जहाज़ और दूसरे कम्प्यूटरीकृत साज़ो सामान भी शामिल है. हालाँकि कहा जा रहा कि काबुल से अंतिम फ्लाइट उड़ने से पहले अमेरिकी सैनिकों ने इन फौजी साज़ो सामान को तबाह कर दिया था मगर मीडिया की ख़बरों के अनुसार उन्हें इतना तबाह नहीं किया कि वह ठीक न हो सकें।

राजनीतिक और डिप्लोमैटिक टीकाकारों का मानना है कि हथियारों का इतने बड़े पैमाने पर अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाना अमेरिका की योजना का हिस्सा है , ताकि अफ़ग़ानिस्तान में अशांति रहे और उसका असर भारत पर पड़ता रहे. भारत एक अनहोनी के अंदेशे से हमेशा घिरा रहे ताकि उसके आगे बढ़ने की रफ़्तार पर लगाम लग सके।

अमेरिका जानता है कि कश्मीर इस क्षेत्र का ऐसा मुद्दा है जिसे पाकिस्तान हमेशा भड़काता रहता है, अमेरिका जानता है कि तालिबान भी भारतीय मुसलमानों और कश्मीर के मुद्दे पर हस्तक्षेप ज़रूर करेगा और इसकी शुरुआत तालिबान ने कर भी दी है. तालिबान के प्रवक्ता सुहेल शाहीन ने साफ़ तौर पर कहा है कि अमारात इस्लामी (अफ़ग़ानिस्तान की नयी तालिबानी सरकार का नाम) को भारत के मुसलमानों की आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार है. शाहीन ने कश्मीर का मुद्दा भी उठाने की बात भी कही।

तालिबान पर पाकिस्तान का रुख तो पहले से ही साफ़ है, इमरान खान की सरकार तालिबान की लगातार मदद करता आ रही है, राजनीतिक भी डिप्लोमैटिक भी और सैन्य रूप में भी. एक तरह से आप कह सकते हैं कि तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में एक सरकार के रूप में खड़ा करने के लिए अमेरिका की अपरोक्ष मदद से वह परोक्ष रूप से सहायता कर रहा है. ISI के चीफ का अफ़ग़ानिस्तान दौरा और तालिबान के टॉप लीडरों से मुलाकात इसका खुला सबूत है. अमेरिका अभी खुलकर सामने नहीं आ रहा है, तालिबान सरकार को मान्यता नहीं देगा ऐसा अभी तक वाशिंगटन की ओर से कोई बयान नहीं आया है , बावजूद इसके कि तालिबान के कई टॉप लीडरों के नाम अंतराष्ट्रीय आतंकियों की सूची में भी हैं. अलबत्ता इस तरह के बयान ज़रूर आये हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि देर सवेर वह तालिबान सरकार को स्वीकार्य कर लेगा।

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कल भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तालिबान सरकार को भारत के लिए एक संकट माना। रक्षा मंत्री की चिंता जायज़ है क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से दुश्मन पाकिस्तान के नापाक इरादे ज़रूर मज़बूत होंगे। लेकिन भारत की असली चिंता अमेरिका है जो पाकिस्तान और तालिबान को अपनी गोद में बिठाकर भारत के खिलाफ एक गन्दा खेल खेल रहा है. भारत के लिए पाकिस्तान हो या तालिबान, निपटना मामूली सी बात है मगर दोस्त के भेष में दुश्मन अमेरिका से होशियार रहने की ज़रुरत है क्योंकि छुपा दुश्मन ज़्यादा खतरनाक होता है।

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